हिंदी साहित्य के रत्न: मैथिलीशरण गुप्त, सूरदास और बहादुर शाह ज़फ़र का साहित्यिक परिचय

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मातृभूमि: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रेरणादायक कविता

यह द्विवेदी युग के प्रतिभाशाली कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त की प्रेरणादायक कविता है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के चिरगाँव में सन् 1885 में हुआ था। साकेत, यशोधरा, पंचवटी आदि उनकी श्रेष्ठ रचनाएँ हैं। सन् 1965 में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का देहांत हुआ।

मातृभूमि का अनुपम सौंदर्य

अपनी जन्मभूमि का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि उसकी हरियाली के लिए नीलाकाश सुंदर वस्त्र की तरह शोभित है। सूर्य और चंद्र मुकुट की तरह दिन-रात उसकी शोभा बढ़ाते हैं। सागर उसकी करधनी है और शेषनाग का फन सिंहासन है। यहाँ की नदियाँ प्रेम का प्रवाह हैंफूल-तारे माँ के आभूषण हैंपक्षीगण स्तुति गीत गाते हैं और बादल अभिषेक भी करते हैं। कवि कहते हैं कि मातृभूमि ईश्वर की सगुण साकार मूर्ति है

बचपन और मातृभूमि का ऋण

अपने बचपन में कवि मातृभूमि की धूल में लोट-लोटकर बड़े हुए हैं। घुटनों के बल पर सरक-सरककर ही पैरों पर खड़े हुए हैं और रामकृष्ण परमहंस की तरह सब सुख पाया। माँ की गोद में खेल-कूदकर आनंद का अनुभव किया।

मातृभूमि के प्रति समर्पण

आगे कवि कहते हैं कि मातृभूमि ने उनके लिए अनेक उपकार किए हैं, उन उपकारों का प्रत्युपकार करने के लिए कवि अशक्त हैं। कवि के मत में हमारा शरीर, प्राण सब मातृभूमि का है। हम मातृभूमि की मिट्टी से जन्मे हैं और उसके लिए प्राण भी न्योछावर करने चाहिए। कविता के माध्यम से कवि हमारे मन में देश के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता के लिए साहस भरते हैं।

मेरे लाल - कृष्ण की बाल-लीला: सूरदास का वात्सल्य वर्णन

सूरदास कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। उनकी प्रमुख रचना सूरसागर की बाल-लीलाएँ वात्सल्य वर्णन का अद्वितीय दृष्टांत है। प्रस्तुत पद कृष्ण की बाल-लीला से संबंधित है। बालक कृष्ण के छोटे दूध के दाँतों को देखकर वे अत्यधिक प्रसन्न हुए। सूरदास उस दृश्य का वर्णन करते हैं।

माँ यशोदा का आनंद

अपने पुत्र के मोहक मुख को देखकर माँ यशोदा अत्यंत प्रसन्न हो जाती हैं। माँ यशोदा स्वयं को भूल जाती हैं। वह अपने पति को बुलाती हैं और पुत्र का सुंदर, सुखदायक रूप देखने को कहती हैं। कृष्ण के छोटे दूध के दाँतों और मुख की हँसी देखकर ऐसा लगता है मानो कमल पर बिजली कौंध गई हो। पत्नी की बातें सुनकर नंद प्रसन्नतापूर्वक भीतर आए और पुत्र का मुख देखकर उनके नयन तृप्त हो गए

वात्सल्य रस का अनुपम उदाहरण

यह पद वात्सल्य रस का उत्तम उदाहरण है। यहाँ मुख कमल के समान है और चमकते हुए श्वेत दाँत बिजली के समान हैं। बालक कृष्ण का सौंदर्य अनुपम है

हे कान्ह: सूरदास की रासलीला का वर्णन

सगुण भक्तिधारा के सर्वश्रेष्ठ कृष्ण भक्त कवि सूरदास का एक पद है - हे कान्ह। सूरसागर में कृष्ण और गोपिकाओं के प्रेम का सरल वर्णन किया गया है। यह सूरसागर के रासलीला से संबंधित एक पद है। कृष्ण वन से मीठी आवाज में मुरली बजा रहे हैं। यहाँ गोपिकाओं पर मुरली की मीठी ध्वनि के प्रभाव का वर्णन किया गया है।

मुरली ध्वनि का गोपिकाओं पर प्रभाव

सूरदास कहते हैं कि जब मुरली की मीठी आवाज सुनाई पड़ी तब सारी गोपिकाएँ चकित हो गईं और सब कामकाज भूल गईं। गोपिकाएँ कुल की मर्यादा, वेद की आज्ञा आदि से बिल्कुल नहीं डरीं। जिस प्रकार सागर में नदियाँ बहकर मिलती हैं, उसी प्रकार गोपिकाएँ रूपी नदियाँ अपने प्रियतम कृष्ण रूपी सागर से मिलने के लिए वन की ओर निकल पड़ींपुत्र और पति का प्यार, गुरुजनों का भय, लज्जा आदि किसी भी बात की उन्होंने परवाह नहीं की। सूरदास कहते हैं कि चतुर एवं सुंदर श्रीकृष्ण ने गोपिकाओं के मन मोह लिया। सूरदास इस पद में कृष्ण और गोपिकाओं के प्रेम का अत्यंत सरस वर्णन किया है।

बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र: अंतिम मुगल शासक का संघर्ष

बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र दिल्ली के अंतिम मुगल शासक थे। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में परास्त होने के बाद, अंग्रेज़ों ने उन्हें बंदी बनाकर रंगून भेजा। उन्हें वहाँ कठोर पीड़ाएँ झेलनी पड़ीं। उनकी बेटी दिल्ली में अंग्रेज़ों की कैद में थी। अपनी बेटी के नाम उन्होंने पत्र लिखा। अपनी बेटी का पत्र उनके लिए आँसुओं से भरा था। तीन बार सुनने पर भी उनको सांत्वना नहीं मिली। अपने परिवार एवं प्रजा के प्रति गहरा प्यार उनके चरित्र की बड़ी विशेषता है।

प्रजा-हितैषी और साहसी शासक

बादशाह अपने देशवासियों के प्रति प्रेम और सहानुभूति रखने वाले प्रजा-हितैषी शासक थे। अपने देश और परिवार से बहुत दूर रहते हुए भी बादशाह का मन अपने परिवार और देशवासियों के प्रति सदा चिंतित रहा

साथ ही बंदी रहते हुए भी वह अपने साथियों पर भरोसा रखने वाले थे। वे बड़े साहसी भी थे। इतनी कठोर नज़रबंदी में रहते हुए भी वह अपनी बेटी को पत्र लिखकर किसी तरह उसे दिल्ली तक पहुँचाते रहे

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