माता का आँचल: बचपन की यादें और महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
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'माता का आँचल' पाठ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
'माता का आँचल' पाठ शिवपूजन सहाय द्वारा रचित एक मार्मिक कहानी है जो बचपन की भोली-भाली यादों और माँ के स्नेह को दर्शाती है। यहाँ इस पाठ पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों और उनके उत्तरों का संकलन है।
1. लेखक किस घटना को याद कर कहता है कि वैसा घोड़मुँहा आदमी हमने कभी नहीं देखा?
अपने बचपन में लेखक और उनके मित्रों की टोली किसी दूल्हे के आगे-आगे जाती हुई ओहारदार पालकी को देख लेते तो बड़े ही ज़ोर से चिल्लाते थे। एक बार ऐसा करने पर एक बूढ़े वर ने उन सबको बड़ी दूर तक खदेड़कर ढेलों से ख़ूब मारा। उसी घटना को याद कर लेखक कहता है कि न जाने किस ससुर ने वैसा जमाई ढूँढ़ निकाला था। उस खूसट-खब्बीस की सूरत लेखक कभी नहीं भुला पाया और कहता है कि वैसा घोड़मुँहा आदमी उसने कभी नहीं देखा।
2. बच्चों द्वारा बनाए गए घरौंदे का वर्णन कीजिए।
लेखक की मित्र-मंडली ने एक दिन घर बनाने का खेल खेलने का निश्चय किया। वे तिनकों का छप्पर, दियासलाई की पेटियों के किवाड़, घड़े के मुँह का चूल्हा-चक्की, दीए की कड़ाही और पूजा की आचमनी से कलछी बनाते थे। पानी, धूल और बालू को मिलाकर ज्योनार (भोज) तैयार किया जाता था। फिर पंगत बिठाई जाती थी। पंगत के अंत में जब पिताजी भी जीमने (खाने) बैठते, तो उन्हें बैठा देखकर सब बच्चे हँसने लगते और अपना घरौंदा बिगाड़कर भाग जाते थे। वे लोटपोट होकर पूछते, "फिर कब भोजन होगा भोलानाथ?" इस प्रकार, लेखक ने बच्चों के अद्भुत व विचित्र घरौंदे का सजीव चित्रण अंकित किया है।
3. 'माता का आँचल' पाठ में लड़कों की मंडली विवाह की क्या-क्या तैयारियाँ करती थी?
'माता का आँचल' पाठ में लड़कों की मंडली बारात निकालने का खेल खेलती थी। वे कनस्तर को तंबूरा बनाकर बजाते, अमोले को घिसकर उससे बड़े मज़े से शहनाई बजाते और टूटी हुई चूहेदानी को कपड़े से ढककर पालकी बना लेते थे। कुछ बच्चे समधी बनकर बकरे पर चढ़ लेते थे और बारात चबूतरे के चारों ओर घूमकर दरवाज़े पर लगती थी। वहाँ काठ की पटरियों से घिरे, गोबर से लिपे, आम और केले की टहनियों से सजे छोटे आँगन में कुल्हड़ का कलसा रखा रहता था। वहीं पहुँचकर बारात फिर लौट आती थी। लौटते समय खटोली पर लाल पर्दा डालकर उस पर दुल्हन को चढ़ा लिया जाता था। जब बाबूजी दुल्हन का मुँह देखते तो सब बच्चे हँस पड़ते थे।
4. 'माता का आँचल' पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि बच्चे सरल, निर्दोष और मस्त होते हैं।
यह कहावत सत्य है कि बच्चे मन के सच्चे और सरल होते हैं। 'माता का आँचल' पाठ में यह स्पष्ट दिखता है:
- सरलता और निर्दोषता: उनके मन में जो भाव उठते हैं, वे उन्हें बड़ी ही सहजता एवं सरलतापूर्वक कह देते हैं। वे मन से भी निर्दोष और निर्मल होते हैं। वे बूढ़े दूल्हे को पसंद नहीं करते, इसलिए उसे 'खूसट' कह देते हैं, जिसके कारण बूढ़ा दूल्हा उनके पीछे पड़ जाता है।
- नादानी और शरारतें: बिना सोचे-समझे मूसन तिवारी को चिढ़ाना या चूहे के बिल में पानी डालना, उनकी मासूमियत और नादानी का ही उदाहरण है। वे नहीं जानते थे कि उनकी शरारतों का क्या दुष्परिणाम हो सकता है।
- मस्ती: बच्चे खेल में इतने मस्त हो जाते हैं कि उन्हें घर-बार, यहाँ तक कि अपने माता-पिता की भी याद नहीं आती। उनका जीवन किसी प्रकार की चिंता व भय से मुक्त होता है और वे हर पल का आनंद लेते हैं।