आयुर्वेद में मर्म विज्ञान: 107 मर्मों की परिभाषा, वर्गीकरण और महत्व
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मर्म की परिभाषा
विषमस्पन्दन यत्र पीड़िते रुक च मर्म तत्। (अ.ह.शा. 4/37)
शरीर के जिन स्थानों पर (स्पन्दन) दबाने से अत्यंत पीड़ा होती है, वे मर्म कहलाते हैं।
मारयन्तीति मर्मणि। (डल्हण)
जिसके कारण मृत्यु होती है, वे मर्म कहलाते हैं। परन्तु शरीर में जितने मर्म हैं, उन पर आघात लगने से सभी मर्मों से मृत्यु नहीं होती, इसलिए आचार्य अरुण दत्त ने कहा है:
अपि च मरणकारित्वान्मर्मः मरणवत् दुःखदायित्वात् वा इति।
मृत्यु के समान दुःख देने के कारण ही इन स्थानों को मर्म कहा जाता है। कुछ मर्म आघात अथवा चोट लगने से पीड़ा उत्पन्न करते हैं, कुछ मर्म विकलांगता उत्पन्न करते हैं तथा कुछ मर्मों पर आघात लगने से कुछ समय के पश्चात् मृत्यु हो जाती है।
मर्म का महत्व
मर्माणि शल्य विषयार्ध। (सु.शा. 6/35)
शल्य चिकित्सक को शरीर के सम्पूर्ण मर्मों का ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि शल्य कर्म करते समय मर्म प्रदेशों को बचाना चाहिए। इसीलिए मर्म, शल्य विषय का आधा भाग कहलाते हैं।
मर्मों की संख्या
संख्या- सप्तोत्तरं मर्मशतम्। (सु.शा 6/3)
मर्मों की कुल संख्या 107 होती है।
- शाखा: 11 × 4 = 44
- मध्य शरीर: 26
- उर्ध्वजत्रुगत: 37
- कुल: 107
अधोशाखा के मर्म (11 प्रत्येक पैर में)
विटप मर्म, लोहिताक्ष मर्म, उर्वी मर्म, आणि मर्म, जानु मर्म, इन्द्रबस्ति मर्म, गुल्फ मर्म, कूर्चशिर मर्म, कूर्च मर्म, तलहृदय मर्म, क्षिप्र मर्म।
इसी प्रकार दूसरे पैर में भी यही मर्म होते हैं।
उर्ध्वशाखा के मर्म
उर्ध्वशाखा (हाथों) के मर्म अधोशाखा के समान ही होते हैं, केवल कुछ स्थानों पर नाम परिवर्तन होता है:
- गुल्फ मर्म के स्थान पर मणिबंध मर्म
- जानु मर्म के स्थान पर कूर्पर मर्म
- विटप मर्म के स्थान पर कक्षधर मर्म
अन्य सभी मर्म अधोशाखा के मर्मों के समान होते हैं। इस प्रकार उर्ध्व तथा अधोशाखा में कुल 44 मर्म होते हैं।
मध्य शरीर के मर्म (26)
उदर व उर में (12)
- 1 हृदय मर्म, 1 बस्ति मर्म, 1 नाभि मर्म, 1 गुद मर्म, 2 स्तनमूल मर्म, 2 स्तनरोहित मर्म, 2 अपलाप मर्म, 2 अपस्तम्भ मर्म।
पृष्ठ (पीठ) में (14)
- 2 कटिकतरुण मर्म, 2 नितम्ब मर्म, 2 बृहती मर्म, 2 अंसफलक मर्म, 2 कुकुन्दर मर्म, 2 पार्श्व सन्धि मर्म, 2 अंस मर्म।
उर्ध्वजत्रुगत मर्म (37)
- 2 नीला मर्म, 2 मन्या मर्म, 8 मातृका मर्म, 2 विधुर मर्म, 2 अपांग मर्म, 2 कृकाटिका मर्म, 2 फण मर्म, 2 आवर्त मर्म, 2 उत्क्षेप मर्म, 2 शंख मर्म, 5 सीमन्त मर्म, 4 श्रृङ्गाटक मर्म, 1 स्थपनी मर्म, 1 अधिपति मर्म।
रचनानुसार मर्मों के प्रकार
रचना के आधार पर मर्मों के 5 प्रकार बताए गए हैं:
- मांस मर्म (11): इन्द्रबस्ति मर्म (4), तलहृदय मर्म (4), गुद मर्म (1), स्तनरोहित मर्म (2)।
- सिरा मर्म (41): अपांग मर्म (2), नीला मर्म (2), लोहिताक्ष मर्म (4), मन्या मर्म (2), फण मर्म (2), मातृका (8), अपलाप मर्म (2), हृदय मर्म (1), अपस्तम्भ मर्म (2), नाभि मर्म (1), पार्श्वसन्धि मर्म (2), उर्वी मर्म (4), बृहती मर्म (2), श्रृंगाटक मर्म (4), स्तनमूल मर्म (2), स्थपनी मर्म (1)।
- स्नायु मर्म (27): विटप मर्म (2), आणि मर्म (4), कक्षधर मर्म (2), क्षिप्र मर्म (4), विधुर मर्म (2), बस्ति मर्म (1), अंस मर्म (2), उत्क्षेप मर्म (2), कूर्च मर्म (4), कूर्चशिर मर्म (4)।
- अस्थि मर्म (8): कटिकतरुण मर्म (2), नितम्ब मर्म (2), अंसफलक मर्म (2), शंख मर्म (2)।
- सन्धि मर्म (20): सीमन्त मर्म (5), कूर्पर मर्म (2), अधिपति मर्म (1), जानु मर्म (2), मणिबंध मर्म (2), गुल्फ मर्म (2), कृकाटिका मर्म (2), आवर्त मर्म (2), कुकुन्दर मर्म (2)।
परिणामानुसार मर्मों के प्रकार
मर्मों पर आघात या चोट लगने के परिणाम के आधार पर इन्हें 5 श्रेणियों में बाँटा गया है:
- सद्यः प्राणहर मर्म (19): ये आग्नेय महाभूत प्रधान होते हैं। इन पर आघात लगने से 7 दिन के भीतर मृत्यु हो जाती है। (हृदय, बस्ति, नाभि, गुद, अधिपति, मातृका, शंख, श्रृंगाटक)।
- कालान्तर प्राणहर मर्म (33): ये आग्नेय तथा सौम्य महाभूत प्रधान होते हैं। इन पर आघात लगने से 15 दिन अथवा 1 मास में मृत्यु हो जाती है। (स्तनमूल, स्तनरोहित, अपलाप, अपस्तम्भ, कटिकतरुण, नितम्ब, पार्श्वसन्धि, बृहती, क्षिप्र, तलहृदय, इन्द्रबस्ति, सीमन्त)।
- वैकल्यकर मर्म (44): ये सौम्य महाभूत प्रधान होते हैं। इन पर आघात लगने से विकलांगता उत्पन्न होती है। (लोहिताक्ष, आणि, विधुर, कृकाटिका, अंस, अंसफलक, जानु, उर्वी, कूर्च, अपांग, विटप, नीला, कूर्पर, मन्या, कुकुन्दर, फण, आवर्त, कक्षधर)।
- विशल्यघ्न मर्म (3): ये वायु महाभूत प्रधान होते हैं। जब तक शल्य (विदेशी वस्तु) मर्म में रहता है, व्यक्ति जीवित रहता है, किन्तु शल्य निकालने पर वायु निकल जाने से मृत्यु हो जाती है। (उत्क्षेप, स्थपनी)।
- रुजाकर मर्म (8): ये अग्नि तथा वायु महाभूत प्रधान होते हैं। इन पर आघात से तीव्र पीड़ा (रुजा) होती है। (गुल्फ, मणिबंध, कूर्चशिर)।
मर्मों का प्रमाण (Measurement)
- 1 अंगुल प्रमाण: उर्वी, विटप, स्तनमूल, कूर्चशिर, कक्षधर मर्म।
- 2 अंगुल प्रमाण: गुल्फ, मणिबंध मर्म।
- 3 अंगुल प्रमाण: कूर्पर, जानु मर्म।
- स्वपाणितल प्रमाण (हथेली के बराबर): हृदय, बस्ति, नाभि, गुद, नीला, मन्या, मातृका, श्रृंगाटक, सीमन्त, कूर्च मर्म।
- अर्ध अंगुल (1/2) प्रमाण: शेष सभी 56 मर्म।