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पाण्डुरोग निदान – अतिस्निग्ध, गुरु, अम्ल, लवण, मद्य आदि का अत्यधिक सेवन, अतिश्रम, रात्रिजागरण, मानसिक तनाव, आम उत्पन्न करने वाले आहार, कृमि, रक्तक्षय, शोणितदोष, अत्यधिक रतिक्रिया एवं धातुक्षयजन्य कारण।
सम्प्राप्ति चक्र – निदान सेवन से दोष प्रकोप (विशेषतः पित्त व वात), अग्निमान्द्य, रसधातु दोष, रुधिरदोष, वर्णभेद (श्वेत, पीत, हरित, नीलाभ), ओजक्षय व बलक्षय होकर पाण्डुरोग प्रकट होता है।
सम्प्राप्ति घटक – दोष मुख्यतः पित्त सहवात कफ, दुष्य रस रुधिर ओज, जठराग्नि मन्द्य व धात्वग्नि मन्द्य, स्रोतस् रसवह रुधिरवह आमाशय संबंधी, स्रोतदुष्टि प्रकार संग व क्षय।
भेद – वातज पाण्डु (त्वचा श्याम, काष्ठवत्, शूलयुक्त), पित्तज पाण्डु (त्वचा पीत, दाह, तृष्णा, ज्वरयुक्त), कफज पाण्डु (गौरव, श्वेतता, आलस्य, तन्द्रा), संयुक्तज पाण्डु (मिश्रित लक्षण), मृद्भक्षणज पाण्डु (मृत्तिका सेवन, उदरशूल, कृशता, प्लीहा वृद्धि)।
पूर्वरूप – त्वचा का वर्ण पीताभ या श्वेत, बलक्षय, आलस्य, हृदयस्पन्दन असामान्य, नेत्र नख ओष्ठ का पीताभ होना, तृष्णा, अरुचि, स्वप्न में मृत्तिका सेवन की इच्छा।
लक्षण – त्वचा नेत्र नख ओष्ठ का पीत या श्वेत वर्ण, हृदयदौर्बल्य व श्वासकष्ट, गौरव, तन्द्रा, आलस्य, बलक्षय व कृशता, स्वेदाधिक्य, ज्वर, शूल, अंगमर्द, प्लीहा वृद्धि, मृत्तिका सेवन की आदत (विशेषतः मृद्भक्षणज पाण्डु में)।
कामला
निदान गुरु, स्निग्ध, पित्तवर्धक आहार का अधिक सेवन, मद्यपान, मांस, दधि, तेलीय पदार्थों का अत्यधिक सेवन, दूषित जल/भोजन से उत्पन्न यकृत विकार, क्रोध, मानसिक तनाव, रात्रिजागरण,यकृत-प्लीहा रोग, पित्ताशय की नलिका में अवरोध
सम्प्राप्ति चक्र- निदान सेवन →पित्तदोष की वृद्धि →रसायन धातु एवं रक्त धातु का दूषण → यकृत एवं प्लीहा का विकार → पित्त का रक्त में अत्यधिक संचरण → रक्तवर्ण, त्वचावर्ण व नेत्रवर्ण का पीला होना → मूत्र पीला व मल वर्णहीन होना → = कामला
सम्प्राप्ति घटक
दोष – प्रमुख रूप से पित्त दोष
दूष्य – रसा, रक्त धातु
अग्नि – जठराग्नि एवं धात्वाग्नि मंद्य
स्रोतस – रसायन व रुधिरवाह स्रोतस
स्थान – यकृत (Yakrit), प्लीहा (Plīhā), आमाशय
व्याधि स्वरूप – रक्त एवं धातुओं का पित्तदुष्टि जन्य विकार
कामला के भेद कोष्ठशाखाश्रिता कामला, कोष्ठाश्रिता कामला, शाखाश्रिता कामला
लक्षण- त्वचा, नेत्र, नख, मुख का पीला होना, मूत्र गाढ़ा पीला/लाल, मल का वर्ण फीका, ज्वर, अरुचि, वमन, तृष्णा, शरीर में दुर्बलता व आलस्य, अंगों में भारीपन
1. कोष्ठशाखाश्रिता कामला कारण – आमाशय में आहार रस दूषित होकर रसायन धातु में विकृति करना।लक्षण – भूख न लगना, अरुचि, पीलापन, हल्का ज्वर, अल्प मूत्र, मल का वर्ण फीका। यह प्रारंभिक अवस्था होती है।
2. कोष्ठाश्रिता कामला कारण – दोष मुख्यतः आमाशय व यकृत (कोष्ठ) में संचित होकर रोग उत्पन्न करते हैं। लक्षण – गाढ़ा मूत्र, मल का वर्ण बहुत फीका, ज्वर, तीव्र पीलापन, अंगशिथिलता। यकृत विकार (हेपेटाइटिस) की ओर संकेत करता है।
3. शाखाश्रिता कामला कारण – दोष कोष्ठ से निकलकर धातु व रक्त (शाखा) में फैल जाते हैं। लक्षण – सम्पूर्ण शरीर में तीव्र पीलापन, अत्यधिक दुर्बलता, रक्तवर्ण परिवर्तन, दाह, मूर्छा। यह गंभीर अवस्था है और जटिलता की ओर बढ़ती है।