भर्तृहरि के वाक्यविषयक आठ मौलिक सिद्धांत: संरचना और अर्थ की व्याख्या
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भर्तृहरि के वाक्यविषयक आठ सिद्धान्तों की विस्तृत विवेचना
परिचय:
1. पदपदार्थसंग्रह सिद्धान्त
यह सिद्धान्त कहता है कि वाक्य, पदों (शब्दों) का समूह है और वाक्यार्थ, उन पदों के अर्थों का संकलन है। अर्थात्, जब हम वाक्य को समझते हैं तो हम प्रत्येक पद के पृथक अर्थ को ग्रहण करते हैं और फिर उनको मिलाकर संपूर्ण वाक्यार्थ निकालते हैं।
मुख्य विचार:
- वाक्य = पदों का क्रमबद्ध समूह
- वाक्यार्थ = पदार्थों का योग
उदाहरण:
“रामः वनं गच्छति” — इसमें “रामः”, “वनं” और “गच्छति” तीन पद हैं।
समीक्षा:
यह सिद्धान्त नैयायिकों द्वारा समर्थित था, किंतु भर्तृहरि इसे पर्याप्त नहीं मानते क्योंकि इससे वाक्य की समग्रता का बोध नहीं होता।
2. योग्यतासिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार, वाक्यार्थ तब ही संभव है जब पदों के अर्थों में आपसी संगति अथवा योग्यता हो। यदि अर्थों में आपसी विरोध या असंगति हो तो वाक्यार्थ ग्रहण नहीं किया जा सकता।
मुख्य विचार:
- योग्यता = पदार्थों में संगति होना
- केवल संगत अर्थों से ही वाक्यार्थ सम्भव है
उदाहरण:
“नीलो लोहितः पुष्पः” — यहाँ ‘नीला’ और ‘लाल’ एक साथ एक ही पुष्प के लिए प्रयोग किए गए हैं, जो तात्त्विक रूप से असंगत हैं, अतः वाक्यार्थ अस्पष्ट हो जाएगा।
समीक्षा:
यह सिद्धान्त मीमांसकों और नैयायिकों द्वारा मान्य था, परन्तु भर्तृहरि इसे वाक्यग्रहण की एक शर्त मानते हैं, मूल कारण नहीं।
3. आसत्तिसिद्धान्त
आसत्ति का अर्थ है निकटता या सन्निकर्ष। इस सिद्धान्त के अनुसार, पदों के बीच यदि मानसिक अथवा ध्वन्यात्मक निकटता हो, तभी वाक्य का अर्थ ग्रहण किया जा सकता है। वाक्य की एकता और क्रमबद्धता आवश्यक है।
मुख्य विचार:
- पदों का सही क्रम
- शब्दों की ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक निकटता
उदाहरण:
“फलं रामः खादति” और “रामः फलं खादति” — दोनों वाक्य सही हैं क्योंकि पदों में आसत्ति है, लेकिन “खादति फलं रामः” में भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
समीक्षा:
यह सिद्धान्त व्यावहारिक है, परन्तु भाषिक प्रयोग में हमेशा पूर्ण आसत्ति नहीं पाई जाती, फिर भी अर्थ ग्रहण हो जाता है — इस दृष्टि से इसकी सीमाएं हैं।
4. आख्यातसिद्धान्त
इस सिद्धान्त में यह कहा गया है कि वाक्य की आत्मा “आख्यात” (क्रिया) है। बिना क्रिया के कोई भी वाक्य पूर्ण नहीं होता। क्रिया ही अन्य पदों के साथ संबंध स्थापित करती है।
मुख्य विचार:
- वाक्य = क्रिया प्रधान संरचना
- अन्य पदों की अपेक्षा क्रिया से ही अर्थ स्पष्ट होता है
उदाहरण:
“रामः” — इससे केवल कर्ता का बोध होता है। लेकिन “रामः पठति” — इसमें क्रिया से संपूर्ण वाक्यार्थ स्पष्ट होता है।
समीक्षा:
मीमांसक इस सिद्धान्त के समर्थक हैं। भर्तृहरि इसे आंशिक रूप से स्वीकार करते हैं, परंतु वाक्य को केवल क्रिया पर आधारित मानना संपूर्ण नहीं है।
5. एकवाक्यत्वसिद्धान्त
भर्तृहरि स्वयं इस सिद्धान्त के प्रमुख प्रवर्तक हैं। इसके अनुसार वाक्य एक समग्र सत्ता है। पदों के पृथक अर्थ न लेकर, वाक्य को एक एकता (whole) के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए।
मुख्य विचार:
- वाक्य एक एकात्म सत्ता है
- वाक्य का अर्थ एक ही बार में संपूर्ण रूप से ग्रहण होता है
उदाहरण:
जब हम “गायत्री पाठ कर रही है” सुनते हैं, तो हमें एक ही बार में पूरा बोध होता है, न कि अलग-अलग शब्दों के अर्थों का जोड़।
समीक्षा:
यह सिद्धान्त भाषिक अनुभव के अधिक निकट है। भर्तृहरि का यही मत था कि वाक्यार्थ एक क्षण में समग्र रूप से अवतरित होता है — इसे प्रतिभा से ग्रहण किया जाता है।
6. अनुबन्धसिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार वाक्य में प्रयुक्त पदों के बीच एक प्रकार का अनुबन्ध (संबंध या जुड़ाव) होता है, जिससे वाक्यार्थ निकलता है। यह संबंध व्याकरणिक (जैसे विभक्ति, काल, लिंग आदि) हो सकता है, या अर्थगत।
मुख्य विचार:
- पदों में संबंध के द्वारा अर्थ की अभिव्यक्ति
- अनुबन्ध व्याकरणिक भी हो सकता है और भाषिक भी
उदाहरण:
“रामः सीतया सह वनं गच्छति” — यहाँ पदों में लिंग, वचन, काल आदि का अनुबन्ध है, जिससे वाक्य का सही अर्थ प्राप्त होता है।
समीक्षा:
यह सिद्धान्त वाक्य की संरचना को समझने में सहायक है, लेकिन यह वाक्यार्थ के पूर्ण ग्रहण की व्याख्या नहीं कर पाता।
7. संख्यासिद्धान्त
यह सिद्धान्त कहता है कि वाक्य में प्रयुक्त पदों की संख्या और क्रम महत्वपूर्ण हैं। यदि पदों की संख्या पूरी न हो या उनका क्रम उलट जाए, तो वाक्य का अर्थ या तो बिगड़ जाएगा या असंभव हो जाएगा।
मुख्य विचार:
- पदों की पूर्णता और उचित क्रम
- संख्या में कमी वाक्यार्थ को अस्पष्ट बना देती है
उदाहरण:
“गुरुः शिष्यं पठति” (गुरु पढ़ाता है) और “शिष्यः गुरुं पठति” (शिष्य गुरु को पढ़ाता है)
समीक्षा:
यह सिद्धान्त व्याकरणिक दृष्टि से सटीक है, परन्तु भाषिक प्रयोगों में कभी-कभी क्रम बदलने पर भी अर्थ ग्रहण हो जाता है।
8. तात्पर्यसिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार वाक्य का अर्थ तभी ग्रहण किया जा सकता है जब वक्ता की मंशा (तात्पर्य) को समझा जाए। वाक्य का प्रयोजन, प्रसंग, वक्ता की भावना और श्रोता की समझ — इन सभी का योगदान होता है।
मुख्य विचार:
- वाक्य का अर्थ संदर्भ पर आधारित होता है
- वक्ता के भाव, लक्ष्य और प्रसंग के अनुसार अर्थ ग्रहण किया जाता है
उदाहरण:
यदि कोई कहे “सिंहः आया” और प्रसंग राजनीति का हो, तो अर्थ होगा — “साहसी नेता आया”।
समीक्षा:
यह सिद्धान्त भाषिक व्यवहार की वास्तविकता को दर्शाता है। यह भाषिक प्रतीक और व्यवहार के बीच के संबंध को स्पष्ट करता है।