कृष्ण के प्रेम और भक्ति के दोहे — बिहारी के ब्रज-चित्रण का सार
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दोहा 1
सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम, सलौनैं गात।
मनौ नीलमनि सैल पर आतपु परयौ प्रभात
इस दोहे में कवि ने कृष्ण के साँवले शरीर की सुंदरता का बखान किया है। कवि का कहना है कि कृष्ण के साँवले शरीर पर पीला वस्त्र ऐसी शोभा दे रहा है, जैसे नीलमणि पहाड़ पर सुबह की सूरज की किरणें पड़ रही हों।
दोहा 2
कहलाने एकत बसत अहि मयूर, मृग बाघ।
जगतु तपोवन सौ कियौ दीरघ दाघ निदाघ॥
इस दोहे में कवि ने भरी दोपहरी से बेहाल जंगली जानवरों की स्थिति का चित्रण किया है। भीषण गर्मी से विषम हाल में, जानवर एक स्थान पर सूने-जैसे बैठे हैं: मोर और साँप साथ, हिरण और बाघ साथ। कवि को लगता है कि गर्मी ने जंगल को तपोवन जैसा कर दिया है — उसी प्रकार जैसे तपोवन में भिन्न-भिन्न लोग आपसी द्वेष भूलकर एक साथ बैठे रहते हैं, वैसे ही गर्मी में ये पशु भी आपसी द्वेष भुलाकर एकत्रित हैं।
दोहा 3
बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करैं भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ॥
इस दोहे में कवि ने गोपियों द्वारा कृष्ण की बांसुरी छुपाने का वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि गोपियाँ मुरली छुपाती हैं ताकि उस अवसर पर वे कृष्ण से निकटता से बातें कर सकें। साथ ही गोपियाँ कृष्ण के सामने थोड़े-बहुत नखरे भी दिखाती हैं — वे अपनी भौंहों से नज़रें और भाव दिखाती हैं, पर शब्दों में हर बात प्रकट नहीं होती।
दोहा 4
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौं में करैं नैननु हीं सब बात॥
यह दोहा उस अवस्था को दर्शाता है जब भीड़ में भी दो प्रेमी चुपचाप और नाजुक भावों के साथ बातें करते हैं, जिसे पहले कोई न समझे। इस स्थिति में नायक और नायिका आँखों ही आँखों में रूठते, मनाते, मिलते, खिलते और कभी-कभी लज्जित भी हो जाते हैं; सारी बातें केवल आँखों और हाव-भाव से ही चली जाती हैं।
दोहा 5
बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह॥
इस दोहे में कवि ने जेठ माह की तेज गर्मी का चित्रण किया है। कवि कहता है कि जेठ की गर्मी इतनी तीव्र होती है कि छाया भी छाया ढूँढ़ रही होती है। ऐसी गरमी में छाया कहीं दिखाई नहीं देती; वह या तो घने बन में बैठी होती है या किसी घर के भीतर-पहिये में।
दोहा 6
कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥
यह दोहा नायिका की मनोदशा को व्यक्त करता है जो अपने प्रेमी को संदेश भेजना चाहती है पर शब्दों में वह सब समा नहीं पाती। कागज़ पर लिखने से वह संदेश पूरा नहीं बनता और संदेशवाहक के सामने कहने में उसे लज्जा भी आती है। फिर भी वह संदेशवाहक से कहती है कि तुम मेरे अति निकट हो, इसलिए अपने हृदय से मेरे हृदय की बात कह देना।
दोहा 7
प्रगट भए द्विजराज कुल, सुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराइ॥
कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने ब्रज में चंद्रवंश में जन्म लिया — अर्थात् स्वयं अवतार लेकर आये। बिहारी के पिता का नाम केसवराय था, इसलिए वे श्रीकृष्ण को पिता-समान मानकर कहते हैं: हे केसव/केसवराय, आप मेरे सारे कष्ट हर लें।
दोहा 8
जपमाला, छापैं, तिलक सरै न एकौ कामु।
मन काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु॥
यह दोहा आडंबर और ढोंग पर कटाक्ष है। बाहरी कर्म—माला जपना, माथे पर तिलक लगाना, बार-बार नाम लिखना—स्वयं में पर्याप्त नहीं हैं। मन क्षणभंगुर और नाज़ुक है; यदि मन सच्चे भक्ति-भाव से प्रभु की आराधना करे तो वही सबसे सार्थक होता है।
संक्षेप
- प्रत्येक दोहा ब्रज की लीलाओं, प्रेम-भाव और भक्ति के सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत करता है।
- कवि ने साधारण दृश्य (गर्मी, भीड़, मुरली छिपाना) के माध्यम से गहरे मनोभावों और आध्यात्मिक अर्थों को व्यक्त किया है।
- बाहरी कर्मों की तुलना में आंतरिक भक्ति और भाव की महत्ता पर बल दिया गया है।
स्रोत और भाषा
ये दोहे ब्रज भाषा/बोलियों के लक्षण लिये हुए हैं; इसलिए कई शब्दों में लोक-लहजा और परंपरागत उच्चारण दिखता है। व्याकरणिक-संशोधन मुख्यतः स्पष्टता और आधुनिक हिन्दी मानक के अनुरूप किए गए हैं, परन्तु मूल भाव और शाब्दिकता अपरिवर्तित रखी गयी है।
कम्पोज़िशन नोट
दोहों और टिप्पणियों का क्रम मूल दस्तावेज के अनुरूप रखा गया है; केवल वर्तनी, विराम-चिह्न और कुछ शब्दों के मानकीकरण से पठनीयता में सुधार किया गया है।