हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों के कालजयी दोहे और पद

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डॉ. पुष्पपाल सिंह द्वारा संपादित 'कबीर ग्रन्थावली'

1. गुरुदेव कौ अंग

  • दोहा 3: हंउवावारी पांणीं विणुं, तिमि गुरु विणुं ग्यान न होइ। ज्यों सीप बिन मुति न निपजै, त्यों गुरु बिनु मुति न होइ॥
  • दोहा 7: सतगुर कबीर परगट भया, सति सब्द की ओट। पापी जीव सब उधरे, लागै कहुं न चोट॥
  • दोहा 11: सतगुर मिलिया त का भया, जे चित्त न भया सुद्ध। पड़ि कपाट तौ क्या भया, जे हियै न उपजी बुद्ध॥

2. प्रेम कौ अंग

  • दोहा 34: कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नांहि। सीस उतारे हाथि करि, सो पैठे घर मांहि॥

3. विरह कौ अंग

  • दोहा 5: कबीर विरह भुवंगम तन बसै, मन्त्र न लागै कोइ। राम वियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ॥
  • दोहा 10: विरहिणी ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझै धाइ। एक सबद कहि पीव का, कब रे मिलैगे आइ॥
  • दोहा 21: चोट सताणीं विरह की, सब तन जरजर होइ। मारणहारा जांणईं, कै जेहि लागी सोइ॥
  • दोहा 22: विरह जलन्ती मैं फिरूँ, मो देखि जलै बनराइ। जिहिं बन विरहिणी पग धरै, सो बनु जलै न डाहि॥

4. पतिव्रता कौ अंग

  • दोहा 2: कबीर रेख सिन्दूर की, काजल दिया न जाइ। नैनू रमैया रमि रहा, दूजा कहाँ समाइ॥
  • दोहा 4: पतिव्रता मैली भली, गले काँच की माल। सब सखियों में यों दिपै, ज्यों रवि की उजियाल॥

5. चेतावनी कौ अंग

  • दोहा 12: कबीर अजहूँ चेतिए, जब लग बेणीं माँहि। तेल घट्या बाती बुझी, सोवैगा दिन राति॥
  • दोहा 13: आजु कहै मैं कालि भजौं, कालि कहै फिरि कालि। आजु कालि के करत हीं, औसर जासी चालि॥

6. मन कौ अंग

  • दोहा 5: मन जांणै सब बात, जांणत हीं औगुण करै। काहे की कुसलात, हाथि दीप कूँवै पड़ै॥
  • दोहा 12: मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहै कबीर हरि पाइये, मन हीं की परतीत॥
  • दोहा 26: कबीर मन पंछी भया, जहाँ तहाँ उड़ि जाइ। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल खाइ॥

7. माया कौ अंग

  • दोहा 4: माया छाया एक सी, बिरला जांणै कोइ। भगताँ पाछै लगि फिरै, सम्मुख भागे सोइ॥
  • दोहा 11: कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खाँड। कोई मुनि जन उबरै, जे सति सब्द की आँड॥

8. सूरातन कौ अंग

  • दोहा 12: सूरै सिर का सउंदा, कदे न कीजै हारि। कायर देखि डरापईं, सूरै देह संवारि॥
  • दोहा 19: गगन दमामा बाजिया, पड्या नीसांणैं घाउ। खेत बुहारै सूरमां, मुआ न छांडै ठाउ॥
  • दोहा 21: सीस उतारै भुईं धरै, ता ऊपरि धरि पाँव। कहें कबीर यों पाइए, राम नाम का दाँव॥

9. भ्रम विधौंसण कौ अंग

  • दोहा 8: साखी आंखी ग्यान की, समुझि देखु मन माहि। बिनु साखी संसार का, झगड़ा छूटत नाहि॥
  • दोहा 10: ज्यों ज्यों करै विरधुईं, त्यों त्यों ऊपजै मोह। भ्रम की टाटी ना गिरी, गया न मन का छोह॥

10. कुसंगति कौ अंग

  • दोहा 7: कबीर संगति साध की, बेगि करीजै जाइ। दुरमति दूरि गँवाइ सी, देशी सुमति बताइ॥

11. साध कौ अंग

  • दोहा 3: कबीर साधू की सभा, कबूँ न निष्फल जाइ। पारस परसे लोह के, सो भी कंचन होइ॥
  • दोहा 12: साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं। धन का भूखा जो फिरै, सो तो साधू नाहिं॥

सूरदास - सूरसागर सार (संपादक: डॉ. धीरेन्द्र वर्मा)

विनय और भक्ति

  • पद 1: मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
  • पद 4: अबिगत गति कछु कहत न आवै।
  • पद 22: हमारे प्रभु औगुन चित न धरौ।
  • पद 25: अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल।
  • पद 44: चरन कमल बंदौ हरि राई।

बाल लीला

  • पद 18: मैया, मैं नहिं माखन खायौ।
  • पद 43: मैया, कबहीं बढ़ैगी चोटी।

वृन्दावन लीला

  • पद 11: खेलन में को काको गुसैयां।
  • पद 13, 42: रास और प्रकृति का वर्णन।
  • पद 127: गोपी-विरह की पूर्व पीठिका।

राधा-कृष्ण

  • पद 2, 3: प्रथम मिलन और रूप-सौंदर्य।
  • पद 147: प्रेम की प्रगाढ़ता।

भ्रमर गीत

  • पद 68: ऊधौ, अँखियाँ अति अनुरागी।
  • पद 76: मधुकर, श्याम हमारे चोर।
  • पद 80: निरगुन कौन देस को बासी।
  • पद 95, 136: प्रेम की अनन्यता।
  • पद 158, 178, 180: गोपियों का उलाहना।

तुलसीदास - कवितावली (गीता प्रेस, गोरखपुर)

बाल काण्ड

  • पद 1: अवधेस के द्वारे सकारे गए।
  • पद 3: तन की दुति स्याम सरोरुह लोचन।
  • पद 6: पग नूपुर और कर-कंकन का मधुर नाद।

अयोध्या काण्ड

  • पद 1: वन गमन की तैयारी।
  • पद 11, 12: पुर तें निकसी रघुबीर-वधू।
  • पद 18: ग्रामीण वधुओं का स्नेह।

उत्तर काण्ड

  • पद 26-29: कलियुग की भयावहता।
  • पद 33: धूत कहौ, अवधूत कहौ।
  • पद 37: भव-रोग से मुक्ति।
  • पद 57: संसार की निस्सारता।
  • पद 74: राम-नाम की महिमा।

मीराबाई की पदावली (संपादक: परशुराम चतुर्वेदी)

  • पद 2: मन रे परसि हरी के चरन।
  • पद 3: बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
  • पद 9: हेरी माँ! दरस दीवानी बावरी।
  • पद 14: आली रे मेरे नैणा बाण पड्या।
  • पद 15: म्हारा री गिरधर गोपाल, दूसरा न कुँया।
  • पद 17: सखी री लाज बैरण भई।
  • पद 20: दरस बिन दूखण लागे नैण।
  • पद 23: मैं तो साँवरे के रंग राची।
  • पद 30: पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे।
  • पद 33: बाला मैं बैरागिन हूँगी।
  • पद 34: राम नाम रस पीजै मनुआ।
  • पद 39: जोगी मत जा मत जा मत जा।
  • पद 45: ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन।
  • पद 46: कोई कहै मीरा भई रे बावरी।
  • पद 57: प्यारे दरसण दीज्यो आय।
  • पद 76: पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
  • पद 108: मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।
  • पद 113: राणा जी मैं तो गोविंद के गुण गास्याँ।

घनानन्द कवित्त (प्रथम शतक)

  • पद 2: अति सूधो सनेह को मारग है।
  • पद 15: काया की सुधि नाहिं, चित की दुति नाहीं।
  • पद 34: भोर तें साँझ लौं कानन ओर निहारति।
  • पद 40: मीत सुजान अनीत करौ जिन।
  • पद 44: अन्तर में बसौ, पै नाहिंन दीसत।
  • पद 52: लोचन तारा ललात फिरैं।
  • पद 58: ऐसो हियो हित-पगा, कबहूँ न विछोह सो।
  • पद 70: देखिबे को आँखें तरसैं।
  • पद 71: काननि दै अंगुरी रहिहैं।
  • पद 82: बिछुरे तें कहा, मिलिबे ही को जीजत है।

विशेष नोट: यदि आपको इनमें से किसी विशिष्ट पद की व्याख्या या पूरी पंक्तियाँ चाहिए हों, तो कृपया पद संख्या का उल्लेख करें।

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