हिंदी साहित्य के महान कवि और आदिकालीन काव्य परंपरा का विस्तृत विवरण

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रसखान रचनावली: प्रेम और भक्ति का संगम

विद्या निवास मिश्र और सत्यदेव मिश्र द्वारा संपादित 'रसखान रचनावली' के आधार पर 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रसखान' के महत्वपूर्ण अंशों का भावार्थ यहाँ प्रस्तुत है। रसखान के काव्य में भक्ति और श्रृंगार का ऐसा अनूठा संगम है जहाँ वे स्वयं को कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह समर्पित कर देते हैं।

1. प्रेम वाटिका (दोहा संकलित)

'प्रेम वाटिका' में रसखान ने प्रेम के गूढ़ स्वरूप और उसकी मर्यादा का वर्णन किया है।

  • दोहा 1: "मानुष हौं तो वही रसखानि..." (यहाँ रसखान प्रेम की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि प्रेम का मार्ग अत्यंत सूक्ष्म है)।
  • दोहा 2: इसमें प्रेम को 'वाटिका' और कृष्ण-राधा को उसका 'माली-मालिन' बताया गया है।
  • दोहा 6 और 7: प्रेम के मार्ग की निस्वार्थता और इसमें बुद्धि के अहंकार के त्याग पर बल दिया गया है। रसखान कहते हैं कि प्रेम में तर्क नहीं, समर्पण काम आता है।
  • दोहा 11: प्रेम की व्यापकता का वर्णन—कि कैसे प्रेम के बिना जीवन और भक्ति दोनों अधूरे हैं।
  • दोहा 14: प्रेम और काम (लौकिक इच्छा) के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया गया है।
  • दोहा 25: प्रेम की पराकाष्ठा, जहाँ प्रेमी और प्रियतम एक रूप हो जाते हैं।

2. सुजान रसखान (सवैया और कवित्त)

'सुजान रसखान' में कृष्ण की बाल लीला, रूप माधुरी और विरह का अत्यंत सरस वर्णन है।

प्रमुख सवैये और उनके भाव:

  • सवैया 1: "मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन"
    यह रसखान का सबसे प्रसिद्ध सवैया है। वे अगले जन्म में भी ब्रज भूमि से जुड़े रहने की कामना करते हैं—चाहे वे पत्थर बनें, पक्षी बनें या पशु।
  • सवैया 2: "जौ खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदम्ब की डारन"
    कृष्ण की लीलास्थली (यमुना किनारे कदम्ब के पेड़) के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा का वर्णन।
  • सवैया 3: "पाँयनि नूपुर मंजु बजैं, कटि किंकिनि के धुनि की मधुराई"
    बाल कृष्ण के पैरों के नूपुर और कमर की करधनी की मधुर ध्वनि का सुंदर चित्रण।
  • सवैया 6: "धूरि भरे अति सोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी"
    कृष्ण के धूल से सने शरीर और उनकी सुंदर चोटी का बाल-वर्णन। वे कहते हैं कि काग के भाग बड़े हैं जो हरि के हाथ से माखन-रोटी ले गया।
  • सवैया 11: "या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं"
    कृष्ण की लाठी और कंबल के बदले रसखान तीनों लोकों का राज्य छोड़ने को तैयार हैं।
  • सवैया 28: "मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी"
    एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि वह कृष्ण जैसा रूप तो धर लेगी, पर उनकी वह 'मुरली' अपने होठों पर नहीं रखेगी (मुरली के प्रति सौतिया डाह)।
  • सवैया 30: "काननि दै अंगुरी रहिहौं जबहीं मुरली धुनि मन्द बजैहै"
    कृष्ण की वंशी की धुन से सम्मोहित होने और लोक-लाज खोने की विवशता।
  • सवैया 38 और 39: कृष्ण की रूप-माधुरी और उनके दर्शन मात्र से होने वाले आनंद का भावपूर्ण वर्णन।

संक्षिप्त सुझाव:

रसखान की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है। उनके काव्य में 'भक्ति' का आधार 'श्रृंगार' है। विशेषकर सवैया छंद पर उनकी इतनी जबरदस्त पकड़ थी कि उन्हें "सवैयों का सम्राट" भी कहा जाता है। यदि आपको इनमें से किसी विशेष सवैये की पूरी पंक्तियाँ या सप्रसंग व्याख्या लिखनी हो, तो आप पद संख्या बता सकते हैं।

बिहारी रत्नाकर: गागर में सागर

जगन्नाथदास 'रत्नाकर' द्वारा संपादित 'बिहारी रत्नाकर' के आधार पर महाकवि बिहारी के चुनिंदा दोहों का मुख्य भाव यहाँ प्रस्तुत है। बिहारी ने अपने दोहों में 'गागर में सागर' भरा है, जिनमें भक्ति, नीति और श्रृंगार का अद्भुत समन्वय मिलता है।

भक्ति और मंगलाचरण

  • दोहा 1 (मंगलाचरण): "मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ। जा तन की झाँई परै, स्याम हरित दुति होइ॥"
    • बिहारी राधा जी की स्तुति करते हैं कि वे उनकी सांसारिक बाधाओं को दूर करें, जिनके शरीर की आभा मात्र पड़ने से श्रीकृष्ण प्रसन्न (हरे रंग के) हो जाते हैं।

श्रृंगार रस (संयोग और वियोग)

  • दोहा 11 और 31: नायिका के रूप-सौंदर्य और उसकी आँखों के कटाक्ष का वर्णन।
  • दोहा 32 (अनुभव): "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ। सौंह करै भौहनु हँसै, दैन कहै नटि जाइ॥"
    • बातों के आनंद के लालच में राधा ने कृष्ण की बाँसुरी छिपा दी है। वे कसम खाती हैं पर भौहों से हँस देती हैं।
  • दोहा 41, 71, 78: विरह की तड़प और नायिका की क्षीणता का वर्णन। विरह में नायिका इतनी कमजोर हो गई है कि साँस लेते समय वह पेंडुलम की तरह आगे-पीछे डोलती है।
  • दोहा 141: आँखों के मिलन और परिवारों के टूटने (द्वंद्व) का मनोवैज्ञानिक चित्रण।

नीति और लोक-अनुभव

  • दोहा 25: "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। उहि खाए बौरात नर, इहि पाए बौराय॥"
    • सोने (धन) का नशा धतूरे से भी ज्यादा होता है, क्योंकि धतूरा खाने पर पागलपन आता है, जबकि धन केवल पाने मात्र से।
  • दोहा 46, 48: गुणी व्यक्ति के मान और दिखावटी बड़प्पन पर कटाक्ष।
  • दोहा 70 और 73: सत्संगति की महिमा और दुर्जन के साथ का कुप्रभाव।

प्रकृति और अन्योक्ति

  • दोहा 60 (ग्रीष्म वर्णन): "कहलाने एकत बसत, अहि मयूर मृग बाघ। जगतु तपोबन सौ कियौ, दीरिघ दाघ निदाघ॥"
    • भयंकर गर्मी के कारण शत्रु स्वभाव वाले जीव (साँप-मोर, मृग-बाघ) भी द्वेष भूलकर एक साथ बैठे हैं।
  • दोहा 94: आँखों की चंचलता और प्रेम की गहराई का वर्णन।

विविध और दार्शनिक भाव

  • दोहा 191, 192: कृष्ण के श्याम वर्ण और उनकी पीताम्बर धारी छवि का मनोहारी वर्णन।
  • दोहा 201: भक्ति में बाहरी पाखंड (माला, तिलक) के स्थान पर मन की शुद्धि पर बल।
  • दोहा 321, 432: नायक-नायिका के बीच संकेतों के माध्यम से होने वाली बातचीत (नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात)।
  • दोहा 472, 489: वय-संधि (बचपन और जवानी का मिलन) का सूक्ष्म चित्रण।
  • दोहा 689: जीवन के अंतिम सत्य और राम-नाम की महत्ता।

बिहारी के काव्य की मुख्य विशेषताएँ:

  1. कल्पना की समाहार शक्ति: थोड़े शब्दों में बहुत बड़ी बात कहना।
  2. भाषा: शुद्ध और परिमार्जित ब्रजभाषा।
  3. रस: मुख्य रूप से श्रृंगार, लेकिन भक्ति और नीति के भी उत्कृष्ट उदाहरण।
  4. चित्रोपमता: दोहा पढ़ते ही आँखों के सामने दृश्य जीवंत हो जाता है।

हिंदी साहित्य के महान कवियों का समीक्षात्मक परिचय

हिंदी साहित्य के इन महान कवियों पर आधारित समीक्षात्मक प्रश्नों के उत्तर हेतु मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:

1. कबीरदास (निर्गुण भक्ति और समाज सुधार)

  • भक्ति भावना: कबीर की भक्ति 'निर्गुण-निराकार' राम की है। यह ज्ञान और प्रेम का मिश्रण है।
  • गुरु का महत्त्व: कबीर ने गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी ऊँचा स्थान दिया है।
  • सामाजिक चेतना: कबीर प्रथम समाज सुधारक कवि हैं। उन्होंने धार्मिक पाखंडों पर तीखा प्रहार किया।
  • भाषा शैली: उनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है।

2. सूरदास (वात्सल्य और श्रृंगार के सम्राट)

  • भक्ति भावना: सूर की भक्ति प्रारंभ में 'दैन्य' भाव की थी, जो बाद में 'सख्य' भाव में बदल गई।
  • विरह वर्णन: 'भ्रमरगीत' विरह वर्णन का चरमोत्कर्ष है।
  • बाल-लीला वर्णन: सूरदास को 'वात्सल्य रस का सम्राट' कहा जाता है।
  • श्रृंगार भावना: संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सूक्ष्म वर्णन है।

3. तुलसीदास (लोकमंगल और समन्वय)

  • प्रासंगिकता: तुलसी ने 'रामराज्य' की परिकल्पना दी और सामाजिक मर्यादाओं का आदर्श स्थापित किया।
  • समन्वय भावना: हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "तुलसी का संपूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।"
  • भक्ति भावना: उनकी भक्ति 'दास्य' भाव की है।
  • राम भक्त के रूप में तुलसी: तुलसी के लिए राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनकी अटूट आस्था 'रामचरितमानस' में झलकती है।

4. मीराबाई (प्रेम और समर्पण की प्रतिमूर्ति)

  • प्रेम साधना: मीरा की प्रेम साधना 'माधुर्य' भाव की है। वे कृष्ण को पति रूप में स्वीकार करती हैं।
  • काव्य सौंदर्य: उनकी भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है।
  • गीति योजना: मीरा के पद गेय (गाने योग्य) हैं, जिनमें लय और संगीत की प्रधानता है।

5. बिहारीलाल (रीतिसिद्ध कवि)

  • श्रृंगार वर्णन: बिहारी मुख्य रूप से श्रृंगार के कवि हैं।
  • नीति का काव्य: बिहारी ने जीवन के अनुभवों को नीति के दोहों में पिरोया है।
  • बहुज्ञत्व: बिहारी को ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद और दर्शन का गहरा ज्ञान था।

6. घनानन्द (साक्षात् रसमूर्ति)

  • विरह वर्णन: घनानन्द रीतिमुक्त धारा के कवि हैं। उनका विरह 'अंतर्मुखी' है।
  • सौंदर्य चेतना: घनानन्द ने सौंदर्य को मन की अनुभूति माना है।

7. रसखान (कृष्ण प्रेम का रस)

  • भक्ति भावना: मुस्लिम होते हुए भी रसखान की कृष्ण भक्ति अनन्य थी।
  • प्रेम निरूपण: रसखान का प्रेम लौकिक से अलौकिक की ओर जाता है।

आदिकाल: परिस्थितियाँ और साहित्य

1. आदिकाल की सामान्य परिस्थितियाँ

  • राजनीतिक परिस्थिति: यह काल युद्धों और अशांति का काल था। केंद्रीय सत्ता का अभाव था।
  • धार्मिक परिस्थिति: सिद्धों, नाथों और जैन मत का प्रभाव था। रहस्यवाद का उदय हो रहा था।
  • सामाजिक परिस्थिति: समाज जाति-पाँति में बंटा था। नारी को भोग्या माना जाता था।
  • साहित्यिक परिस्थिति: संस्कृत, अपभ्रंश और पुरानी हिन्दी में साहित्य सृजन हो रहा था।

2. नामकरण एवं सीमा निर्धारण

विद्वानप्रस्तावित नाम
आचार्य रामचंद्र शुक्लवीरगाथा काल
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीआदिकाल (सर्वाधिक स्वीकृत)
डॉ. रामकुमार वर्मासंधि काल एवं चारण काल
राहुल सांकृत्यायनसिद्ध-सामंत काल
महावीर प्रसाद द्विवेदीबीजवपन काल

अधिकांश विद्वान संवत 1050 से 1375 (933 ई. से 1318 ई.) तक के समय को आदिकाल मानते हैं।

3. आदिकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  • वीर रस एवं श्रृंगार रस की प्रधानता: युद्धों और सौंदर्य का सजीव चित्रण।
  • आश्रयदाताओं की प्रशंसा: राजाओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा।
  • ऐतिहासिकता का अभाव: घटनाएँ और तिथियाँ कल्पना पर आधारित।
  • युद्धों का सजीव वर्णन: प्रभावशाली और वास्तविक युद्ध चित्रण।
  • डिंगल और पिंगल भाषा: अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी और ब्रज का प्रयोग।
  • विविध छंदों का प्रयोग: दोहा, रोला, छप्पय और आल्हा का प्रयोग।

4. रासो काव्य: सामान्य परिचय

आदिकाल में वीरगाथाओं को 'रासो' कहा गया।

  • पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई): हिन्दी का प्रथम महाकाव्य।
  • बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह): विरह-प्रधान श्रृंगार काव्य।
  • परमाल रासो (जगनिक): इसे 'आल्हाखंड' के नाम से जाना जाता है।
  • खुमाण रासो (दलपति विजय): राजा खुमाण के युद्धों का वर्णन।

5. लौकिक काव्य: सामान्य परिचय

लोक-मनोरंजन के लिए लिखा गया साहित्य लौकिक काव्य कहलाता है।

  • अमीर खुसरो की पहेलियाँ: खड़ी बोली में मनोरंजन प्रधान साहित्य।
  • विद्यापति की पदावली: मैथिली भाषा में भक्ति और श्रृंगार का मिश्रण।

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