वमन और विरेचन: आयुर्वेद की पंचकर्म शोधन चिकित्सा और संसर्जन क्रम

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वमन-विरेचन (संशोधन चिकित्सा)

ऊर्ध्वभाग (मुखमार्ग) से दोषों का निर्हरण वमन कहलाता है तथा अधोभाग (गुदामार्ग) से दोषों का निर्हरण विरेचन कहलाता है।

प्रयोग

  • कफ से होने वाले रोगों में वमन कराते हैं।
  • पित्त से होने वाले रोगों में विरेचन कराते हैं।

वमन कर्म

वमन द्रव्य (Dravya)

मधु, मुलेठी, सेंधा नमक और मदनफल का क्वाथ बनाकर प्रातः काल पिलावें। मदनफल क्वाथ की मात्रा 5 से 8 तोला तक होनी चाहिए।

वमन कर्म विधि

वमन द्रव्यों को विधिपूर्वक पिलाने के बाद प्रातः काल तक प्रतीक्षा करें। जब रोगी के शरीर और सिर पर पसीना आने लगे, तो समझना चाहिए कि दोष अब पिघल रहे हैं। जब शरीर में रोमांच होने लगे, तो यह समझना चाहिए कि दोष अपने स्थान से चल दिए हैं। जब जी मिचलाने लगे और मुख से जल निकलने लगे, तो समझें कि दोष वमन के माध्यम से बाहर निकलने लगे हैं। तब उस व्यक्ति को जानु (घुटने) के समान ऊंचे बिस्तर पर चादर बिछाकर और तकिया लगाकर बैठा दें।

वमन के योग्य पुरुष

जिसने विषपान किया हो, जिसे सर्प ने काटा हो, नवज्वर, अतिसार, कास (खांसी) आदि रोगों में वमन कराना चाहिए।

वमन के अयोग्य

गर्भवती स्त्री, बालक, वृद्ध, हृदयरोगी और अत्यंत दुर्बल व्यक्ति जिसे निरंतर उल्टियां हो रही हों, उन्हें वमन नहीं कराना चाहिए।

वमन के अतियोग के लक्षण

वमन के अधिक मात्रा में हो जाने पर झागदार रक्त की चंद्रिकाएं निकलती हैं और वाणी में रुकावट (स्वर भेद) होती है।

वमन की वेग मात्रा

  • प्रधान वेग शुद्धि: 8 वेग (उल्टी)
  • मध्यम वेग शुद्धि: 6 वेग
  • हीन वेग शुद्धि: 4 वेग

वमन के बाद निर्देश

वमन के बाद रोगी के हाथ-पैर और मुंह धुलवाकर, घर में प्रवेश कराकर और बिस्तर पर बैठाकर इस प्रकार उपदेश दें:

ऊंचा बोलना, एक स्थान पर देर तक बैठना, देर तक खड़े रहना, अधिक दूर तक पैदल घूमना, क्रोध करना, शोक करना, रात्रि में जागना, दिन में सोना, विषम भोजन करना, मल-मूत्र के वेगों को रोकना आदि बातों का मन से भी विचार न करते हुए पूरा दिन बिताएं। इस प्रकार रोगी को उपदेश दें।

विरेचन कर्म

विरेचन कर्म विधि

वमन करा देने के बाद जब मनुष्य स्वस्थ हो जाए, रात्रि में भरपूर सोया हो और दिन में खाया हुआ भोजन पच गया हो, तब उसे निशोथ (Trivrit) का कल्क 1 रुपये की मात्रा के बराबर दूध आदि द्रव में घोलकर पिलावें। रोगी के बल आदि को देखकर जब सम्यक रूप से विरेचन हो जाए, तब उसे स्नान कराएं।

तत्पश्चात चंदन आदि का लेप लगाकर फूल मालाएं और सुंदर वस्त्र आदि धारण कराएं। तब उसे मित्रों और भाइयों के सामने उपस्थित करें और उसे अपनी इच्छानुसार आहार-विहार करने का उपदेश दें।

विरेचन के योग्य पुरुष

गुल्म, अर्श, उदररोग, वमन, योनिरोग, शुक्ररोग आदि रोगों में विरेचन कराना चाहिए।

विरेचन के अयोग्य पुरुष

नवज्वर, अतिसार, रक्तपित्त और शल्य के रोगी आदि में विरेचन नहीं कराना चाहिए।

विरेचन के अतियोग के लक्षण

विरेचन के अधिक होने पर काला खून निकलने लगता है।

विरेचन के वेग

  • उत्तम शुद्धि: 30 बार / 4 प्रस्थ
  • मध्यम शुद्धि: 20 बार / 3 प्रस्थ
  • हीन शुद्धि: 10 बार / 2 प्रस्थ

(Note: विरेचन सामान्यतः वमन के 15 दिन बाद किया जाता है - After 15 days of Vaman)

संसर्जन क्रम

शोधन कर्म (वमन या विरेचन) के बाद रोगी की जठराग्नि मंद हो जाती है। उस स्थिति में रोगी को सीधे भारी भोजन देने से आमदोष उत्पन्न हो सकता है। इसलिए हल्के से भारी आहार की ओर क्रमिक रूप से ले जाने की जो प्रक्रिया है, उसे संसर्जन क्रम कहते हैं।

आवश्यकता

शोधन के बाद जठराग्नि कमजोर हो जाती है। धीरे-धीरे अग्नि को स्थिर और बलवान बनाना पड़ता है ताकि रोगी की आंतरिक शक्ति को पुनः सामान्य स्थिति में लाया जा सके।

क्रम

यह मुख्यतः 3 से 7 दिन तक चलता है, जो शोधन की तीव्रता पर निर्भर करता है:

  1. प्रथम आहार: मांड (चावल का पतला पानी)
  2. द्वितीय आहार: पेय (थोड़ा गाढ़ा, हल्का तरल भोजन)
  3. तृतीय आहार: विलेपी (गाढ़ा दलिया या खिचड़ी जैसी चीज़)
  4. चतुर्थ आहार: अकृत यवागू (हल्का पका हुआ चावल + दाल)
  5. पंचम आहार से आगे: सामान्य खिचड़ी → सामान्य भोजन → नियमित आहार

विशेष ध्यान

  • यदि शोधन मध्यम हुआ है, तो 5 दिन तक संसर्जन क्रम करें।
  • यदि शोधन तीव्र हुआ है, तो 7 दिन तक करें।
  • यदि शोधन अल्प है, तो 3 दिन पर्याप्त हैं।

लाभ

  • पाचन शक्ति की पुनः स्थापना।
  • अग्नि की रक्षा।
  • दोषों की पुनः वृद्धि रोकना।
  • रोगी को सामान्य आहार सहन करने योग्य बनाना।

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