शिक्षा के उद्देश्य और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: एक विस्तृत अवलोकन
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शिक्षा की प्रकृति
- अनवरत प्रक्रिया
- सामाजिक प्रक्रिया
- गतिशील प्रक्रिया
- द्विमुखी प्रक्रिया
- त्रिमुखी प्रक्रिया
- विकास की प्रक्रिया
- सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया
- समायोजन की प्रक्रिया
शिक्षा के उद्देश्य
- वैयक्तिक उद्देश्य
- सामाजिक उद्देश्य
- राष्ट्रीय उद्देश्य
- अन्तरराष्ट्रीय उद्देश्य
शिक्षा उद्देश्य के क्षेत्र
- दर्शन
- समाजशास्त्र
- मनोविज्ञान
- संविधान
- वैश्वीकरण
संविधान के शैक्षिक उद्देश्य
- सम्प्रभुता
- समाजवाद
- पंथनिरपेक्षता
- लोकतंत्र
- स्वतंत्रता
- एकता और अखंडता
- समानता
- विश्व शान्ति
- न्याय
जॉन डीवी का शिक्षा में उद्देश्य
- अनुभवों का पुनर्निर्माण
- वातावरण के साथ अनुकूलन
- सामाजिक कुशलता प्राप्ति
- पूर्व-निश्चित उद्देश्यों में अविश्वास
- गतिशील एवं अनुकूलन योग्य मन का निर्माण
आधुनिक भारतीय समाज के लिए शैक्षिक उद्देश्य
- प्रजातांत्रिक नागरिकता का विकास
- व्यक्तित्व का विकास
- व्यावसायिक दक्षता
- नेतृत्व का विकास
- तार्किक शक्ति का विकास
- मानवता की भावना
- समस्याओं के प्रति जागरूकता
- आध्यात्मिक मूल्यों का विकास
- सामाजिक परिवर्तन हेतु उचित दृष्टिकोण
रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार शिक्षा
- शिक्षा का अर्थ
- टैगोर की शिक्षण विशेषताएँ
- टैगोर शिक्षा के उद्देश्य: संवेगात्मक विकास, जीवन में सामंजस्य, सामाजिक विकास, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास, शारीरिक विकास, मानसिक एवं बौद्धिक विकास।
- टैगोर के अनुशासन संबंधी विचार
- टैगोर के मुख्य विचार: शिक्षार्थी, शिक्षक, शिक्षालय।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में शिक्षा
वैदिक काल
- आस्तिकता एवं धार्मिक प्रवृत्ति, चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का निर्माण, नागरिक कर्तव्यों का पालन, सामाजिक दक्षता, राष्ट्रीय सांस्कृतिक संरक्षण।
बौद्ध काल
- बौद्ध धर्म का प्रचार, व्यावसायिक प्रशिक्षण, जीवन के लिए तैयारी, नैतिक चरित्र का निर्माण।
मध्यकाल
- इस्लाम धर्म प्रचार, मुस्लिम शिक्षण संस्थानों की स्थापना, चरित्र निर्माण, पवित्रता, नैतिकता, राजभक्ति, शिक्षा का प्रसार, बौद्धिक विकास, सांसारिक वैभव।
ब्रिटिश काल
- विज्ञान का प्रचार, पाश्चात्य ज्ञान व अंग्रेज़ी भाषा, अंग्रेज़ी साहित्य, ईसाई धर्म का प्रसार, व्यावसायिक शिक्षा, आधुनिक शिक्षण संस्थाओं का निर्माण।
श्री अरविंद के अनुसार शिक्षा
आध्यात्मिक, ज्ञानेंद्रियों, शारीरिक, मानसिक, अंतःकरण और नैतिक विकास। अंतःकरण के स्तर: चित्त, मन, बुद्धि, ज्ञान।
पश्चिमी शिक्षा: जॉन डीवी
उपयोगिता, रुचि, लचीलापन, क्रियाशीलता, सामाजिक अनुभव, बाल-केंद्रित पाठ्यक्रम, व्यक्तित्व व वृद्धि।
शिक्षा-दर्शन के प्रमुख बिंदु
- शिक्षक-शिक्षार्थी संबंध: शिक्षार्थी केंद्र में, शिक्षक मार्गदर्शक।
- शिक्षण विधि: करके सीखना, स्व-अनुभव, रुचि का सिद्धांत, सह-संबंध।
- व्यावहारिक शिक्षण: क्रिया, समस्या, सूचना, योजना, परीक्षण व प्रयोग।
- अनुशासन: सामाजिक और स्वीकारात्मक अनुशासन।
- विद्यालय: सामाजिक संस्था, प्रयोगशाला, जीवन की तैयारी, लोकतांत्रिक संकल्पना।
शिक्षा में चुनौतियाँ और समानता
विविधताएँ
क्षेत्रीय, भाषायी, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक, भौगोलिक।
भारत में शिक्षा की बाधाएँ
सुविधाओं की कमी, पहुँच की समस्या, गुणवत्ता में गिरावट, राजनैतिक अनिच्छा, शिक्षा की लागत, युवा असंतोष, नैतिक संकट।
शैक्षिक समानता हेतु प्रयास
संस्थाओं में वृद्धि, निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्तियाँ, नवोदय विद्यालय, निरक्षरता उन्मूलन, गुणात्मक प्रयास।