हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत: ताल, स्वरलिपि और ऐतिहासिक विकास

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तीनताल और कहरवा ताल का दुगुन अभ्यास

तीनताल और कहरवा ताल के मूल ठेके को दुगुन में लिखने के लिए पहले यह समझना ज़रूरी है कि दुगुन का अर्थ है: वही ताल, वही मात्रा, लेकिन प्रति मात्रा बोल दोगुने हो जाते हैं।

तीनताल का ठेका और दुगुन

तीनताल 16 मात्राओं का ताल है, जिसकी विभाजन व्यवस्था 4-4-4-4 रहती है और सामान्य ठेका इस प्रकार बोला जाता है:

  • धा धिन धिन धा | धा धिन धिन धा | ना तिन तिन ना | ता धिन धिन धा

इसी ठेके को दुगुन में लिखते समय हर मात्रा पर दो बोल रखे जाते हैं (अर्थात बोलों की गति दुगुनी हो जाती है):

  • धा ति धिन ति | धिन ति धा ति | धा ति धिन ति | धिन ति धा ति | ना ति तिन ति | न ति ना ति | ता ति धिन ति | धिन ति धा ति

कहरवा ताल का ठेका और दुगुन

कहरवा ताल 8 मात्राओं का ताल है, जिसका प्रचलित ठेका सामान्य रूप से इस प्रकार बोला जाता है:

  • धा गे ना ति | न क धि ना

कहरवा के दुगुन में भी प्रति मात्रा बोलों की संख्या दोगुनी कर दी जाती है:

  • धा ति गे ति | ना ति ति न | न ति क ति | धि ति ना ति

लिखने और अभ्यास की क्षमता

  • उत्तर लिखते समय पहले ताल का नाम, मात्राएँ, विभाजन और मूल ठेका साफ-साफ लिखें, फिर उसके नीचे “दुगुन ठेका” शीर्षक देकर दुगुन वाले बोल लिखें।
  • अभ्यास में क्लैप (ताली-खाली) और गिनती (१ २ ३…) को पहले मूल ठेका पर और फिर दुगुन पर बोलते हुए साथ रखें।

संगीत के आधारभूत सिद्धांत

संगीत सिद्धांत के ये सभी शब्द हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मूल आधार हैं।

संगीत, स्वर और अलंकार

  • संगीत (Sangeet): ध्वनि को सुरीले और लयबद्ध रूप में गाना, बजाना और उस पर नृत्य करना।
  • स्वर (Swar): वह सुरीली ध्वनि जिसे निश्चित ऊँचाई (pitch) पर दोहराया जा सके (सा, रे, ग, म, प, ध, नि)।
  • अलंकार (Alankaar): स्वरों की नियमानुसार और क्रमबद्ध गति (आरोह-अवरोह के पैटर्न)।

सप्तक, राग और थाट

  • सप्तक (Saptak): सात स्वरों का समूह (मंद्र, मध्य और तार)।
  • राग (Raag): निश्चित स्वर-समूह, आरोह-अवरोह और भावपूर्ण संगीत-रचना।
  • थाट (Thaat): रागों की उत्पत्ति के लिए बनाया गया मूल स्वर-ढांचा (10 मुख्य थाट)।

जाति, वादी और समवादी

  • जाति (Jaati): प्रयुक्त स्वरों की संख्या (औडव, षाडव, सम्पूर्ण)।
  • वादी स्वर (Vaadi): राग का सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख स्वर।
  • समवादी स्वर (Samvaadi): वादी के बाद दूसरा मुख्य और सहायक स्वर।

विवादी, अनुवादी और वर्जित स्वर

  • विवादी स्वर (Vivadi Swar): राग के स्वभाव से टकराने वाला स्वर।
  • अनुवादी स्वर (Anuvadi Swar): वादी-समवादी के अतिरिक्त सहायक स्वर।
  • वर्जित स्वर (Varjit Swar): राग में निषेध स्वर।

ताल, गत और तोड़ा

  • ताल (Taal): मात्रा, विभाजन, ताली और खाली की निश्चित व्यवस्था।
  • गत (Gat): वाद्य संगीत में राग के भीतर लयबद्ध बंदिश।
  • तोड़ा (Tora): तानों और चलनों से बना वाद्य-अंश।

स्थायी और अंतरा

  • स्थायी (Sthai): गीत का पहला और मुख्य भाग।
  • अंतरा (Antra): रचना का अगला भाग जो ऊँचे स्वरों की ओर जाता है।

भातखंडे स्वर-लिपि पद्धति

V.N. भातखंडे का स्वर-लिपि (Notation) सिस्टम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को सुरक्षित और मानकीकृत करने का सबसे प्रचलित तरीका है।

विशेषताएँ

  • यह प्रणाली देवनागरी लिपि पर आधारित है, जो भारतीय विद्यार्थियों के लिए सरल है।
  • इसमें राग, ताल, लय और अलंकार दिखाने के लिए निश्चित संकेत (symbols) हैं।

लेखन संकेत

  • कोमल स्वर: स्वर के नीचे छोटी रेखा।
  • तीव्र स्वर: स्वर के ऊपर चिन्ह।
  • सप्तक: मंद्र के लिए नीचे बिन्दु, तार के लिए ऊपर बिन्दु।

सितार और वीणा: तंतुवाद्यों का संबंध

सितार और वीणा दोनों भारतीय तंतुवाद्य हैं। वीणा प्राचीन परंपरा का प्रतीक है, जबकि सितार मध्यकाल में विकसित हुआ। दोनों में फिंगरबोर्ड और तूँबा (resonator) की संरचना में समानता है, लेकिन शैली में अंतर है—वीणा कर्नाटक संगीत की आधारशिला है, जबकि सितार हिन्दुस्तानी संगीत का प्रमुख वाद्य है।


भारतीय संगीत का ऐतिहासिक विकास

वैदिक काल

सामवेद को “संगीत का वेद” कहा जाता है। सामगान में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित से सप्तस्वर-पद्धति का विकास हुआ।

नाट्यशास्त्र काल

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में श्रुति, स्वर, ग्राम और ताल की व्यवस्थित व्याख्या की गई, जिससे संगीत को शास्त्रीय आधार मिला।

मध्यकाल

मातंग मुनि के “बृहद्देशी” में पहली बार “राग” की स्पष्ट परिभाषा मिली। शारंगदेव के “संगीत रत्नाकर” को मध्यकाल के संगीत का संपूर्ण संकलन माना जाता है, जिसने हिन्दुस्तानी और कर्नाटक संगीत की नींव रखी।

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