चरक संहिता के ५० महाकषाय और गुरुवादि गुणों का विस्तृत विवरण
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चरक संहिता के ५० महाकषाय (50 Mahakashayas)
१. जीवनीयानि: जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, जीवन्ती और मधुक - ये दस जीवनीयानि होते हैं।
२. बृंहणीयानि: क्षीरिणी, राजक्षवक, अश्वगन्धा, काकोली, क्षीरकाकोली, वाट्यायनी, भद्रौदनी, भारद्वाजी, पयस्या और ऋष्यगन्धा - ये दस बृंहणीयानि होते हैं।
३. लेखनीयानि: मुस्त, कुष्ठ, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, वचा, अतिविषा, कटुरोहिणी, चित्रक, चिरबिल्व और हैमवती - ये दस लेखनीयानि होते हैं।
४. भेदनीयानि: सुवहा, अर्क, उरुबुक, अग्निमुखी, चित्रा, चित्रक, चिरबिल्व, शङ्खिनी, शकुलादनी और स्वर्णक्षीरी - ये दस भेदनीयानि होते हैं।
५. सन्धानीयानि: मधुक, मधुपर्णी, पृश्निपर्णी, अम्बष्ठकी, समङ्गा, मोचरस, धातकी, लोध्र, प्रियङ्गु और कट्फल - ये दस सन्धानीयानि होते हैं।
६. दीपनीयानि: पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शृङ्गवेर, अम्लवेतस, मरिच, अजमोदा, भल्लातकास्थि और हिङ्गुनिर्यासा - ये दस दीपनीयानि होते हैं।
७. बल्यानि: ऐन्द्री, ऋषभ्यतिरसा, ऋष्यप्रोक्ता, पयस्या, अश्वगन्धा, स्थिरा, रोहिणी, बला और अतिबला - ये दस बल्यानि होते हैं।
८. वर्ण्यानि: चन्दन, तुङ्ग, पद्मक, उशीर, मधुक, मञ्जिष्ठा, सारिवा, पयस्या, सिता और लता - ये दस वर्ण्यानि होते हैं।
९. कण्ठ्यानि: सारिवा, इक्षुमूल, मधुक, पिप्पली, द्राक्षा, विदारी, कैटर्य, हंसपादी, बृहती और कण्टकारिका - ये दस कण्ठ्यानि होते हैं।
१०. हृद्यानि: आम्र, आम्रातक, लिकुच, करमर्द, वृक्षाम्ल, अम्लवेतस, कुवल, बदर, दाडिम और मातुलुङ्ग - ये दस हृद्यानि होते हैं।
११. तृप्तिघ्नानि: नागर, चव्य, चित्रक, विडङ्ग, मूर्वा, गुडूची, वचा, मुस्त, पिप्पली और पटोल - ये दस तृप्तिघ्नानि होते हैं।
१२. अर्शोघ्नानि: कुटज, बिल्व, चित्रक, नागर, अतिविषा, अभया, धन्वयासक, दारुहरिद्रा, वचा और चव्या - ये दस अर्शोघ्नानि होते हैं।
१३. कुष्ठघ्नानि: खदिर, अभया, आमलक, हरिद्रा, अरुष्कर, सप्तपर्ण, आरग्वध, करवीर, विडङ्ग और जातीप्रवाल - ये दस कुष्ठघ्नानि होते हैं।
१४. कण्डूघ्नानि: चन्दन, नलद, कृतमाल, नक्तमाल, निम्ब, कुटज, सर्षप, मधुक, दारुहरिद्रा और मुस्त - ये दस कण्डूघ्नानि होते हैं।
१५. क्रिमिघ्नानि: अक्षीव, मरिच, गण्डीर, केबुक, विडङ्ग, निर्गुण्डी, किणिही, श्वदंष्ट्रा, वृषपर्णिका और खुपर्णिका - ये दस क्रिमिघ्नानि होते हैं।
१६. विषघ्नानि: हरिद्रा, मञ्जिष्ठा, सुवहा, सूक्ष्मैला, पालिन्दी, चन्दन, कतक, शिरीष, सिन्धुवार और श्लेष्मातक - ये दस विषघ्नानि होते हैं।
१७. स्तन्यजननानि: वीरण, शालि, षष्टिक, इक्षुवालिका, दर्भ, कुश, काश, गुन्द्रा, इत्कट और कत्तृणमूल - ये दस स्तन्यजननानि होते हैं।
१८. स्तन्यशोधनानि: पाठा, महौषध, सुरदारु, मुस्त, मूर्वा, गुडूची, वत्सकफल, किराततिक्तक, कटुरोहिणी और सारिवा - ये दस स्तन्यशोधनानि होते हैं।
१९. शुक्रजननानि: जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, मेदा, वृद्धरुहा, जटिला और कुलिङ्गा - ये दस शुक्रजननानि होते हैं।
२०. शुक्रशोधनानि: कुष्ठ, एलवालुक, कट्फल, समुद्रफेन, कदम्बनिर्यास, इक्षुकाण्ड, इक्षु, इक्षुरक, वसुक और उशीर - ये दस शुक्रशोधनानि होते हैं।
२१. स्नेहोपगानि: मृद्वीका, मधुक, मधुपर्णी, मेदा, विदारी, काकोली, क्षीरकालोली, जीवक, जीवन्ती और शालपर्णी - ये दस स्नेहोपगानि होते हैं।
२२. स्वेदोपगानि: शोभाञ्जनक, एरण्ड, अर्क, वृश्चीर, पुनर्नवा, यव, तिल, कुलत्थ, माष और बदर - ये दस स्वेदोपगानि होते हैं।
२३. वमनोपगानि: मधु, मधुक, कोविदार, कर्बुदार, नीप, विदुल, बिम्बी, शणपुष्पी, सदापुष्पा और प्रत्यक्पुष्पा - ये दस वमनोपगानि होते हैं।
२४. विरेचनोपगानि: द्राक्षा, काश्मर्य, परूषक, अभया, आमलक, बिभीतक, कुवल, बदर, कर्कन्धु और पीलू - ये दस विरेचनोपगानि होते हैं।
२५. आस्थापनोपगानि: त्रिवृत्, बिल्व, पिप्पली, कुष्ठ, सर्षप, वचा, वत्सकफल, शतपुष्पा, मधुक और मदनफल - ये दस आस्थापनोपगानि होते हैं।
२६. अनुवासनोपगानि: रास्ना, सुरदारु, बिल्व, मदन, शतपुष्पा, वृश्चीर, पुनर्नवा, श्वदंष्ट्रा, अग्निमन्थ और श्योनाक - ये दस अनुवासनोपगानि होते हैं।
२७. शिरोविरेचनोपगानि: ज्योतिष्मती, क्षवक, मरिच, पिप्पली, विडङ्ग, शिग्रु, सर्षप, अपामार्गतण्डुल, श्वेता और महाश्वेता - ये दस शिरोविरेचनोपगानि होते हैं।
२८. छर्दिनिग्रहणानि: जम्बू, आम्रपल्लव, मातुलुङ्ग, अम्ल बदर, दाडिम, यव, यष्टिका, उशीर, मृत् और लाजा - ये दस छर्दिनिग्रहणानि होते हैं।
२९. तृष्णानिग्रहणानि: नागर, धन्वयवासक, मुस्त, पर्पटक, चन्दन, किराततिक्तक, गुडूची, ह्रीवेर, धान्यक और पटोल - ये दस तृष्णानिग्रहणानि होते हैं।
३०. हिक्कानिग्रहणानि: शटी, पुष्करमूल, बदरबीज, कण्टकारिका, बृहती, वृक्षरुहा, अभया, पिप्पली, दुरालभा और कुलीरशृङ्गी - ये दस हिक्कानिग्रहणानि होते हैं।
३१. पुरीषसङ्ग्रहणीयानि: प्रियङ्गु, अनन्ता, आम्रास्थि, कट्वङ्ग, लोध्र, मोचरस, समङ्गा, धातकीपुष्प, पद्मा और पद्मकेसर - ये दस पुरीषसङ्ग्रहणीयानि होते हैं।
३२. पुरीषविरजनीयानि: जम्बु, शल्लकीत्वक्, कच्छुरा, मधूक, शाल्मली, श्रीवेष्टक, भृष्टमृत्, पयस्या, उत्पल और तिल कणा - ये दस पुरीषविरजनीयानि होते हैं।
३३. मूत्रसङ्ग्रहणीयानि: जम्बू, आम्र, प्लक्ष, वट, कपीतन, उडुम्बर, अश्वत्थ, भल्लातक, अश्मन्तक और सोमवल्क - ये दस मूत्रसङ्ग्रहणीयानि होते हैं।
३४. मूत्रविरजनीयानि: पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, शतपत्र, मधुक, प्रियङ्गु और धातकीपुष्प - ये दस मूत्रविरजनीयानि होते हैं।
३५. मूत्रविरेचनीयानि: वृक्षादनी, श्वदंष्ट्रा, वसुक, वशिर, पाषाणभेद, दर्भ, कुश, काश, गुन्द्रा और इत्कटमूल - ये दस मूत्रविरेचनीयानि होते हैं।
३६. कासहराणि: द्राक्षा, अभया, आमलक, पिप्पली, दुरालभा, शृङ्गी, कण्टकारिका, वृश्चीर, पुनर्नवा और तामलकी - ये दस कासहराणि होते हैं।
३७. श्वासहराणि: शटी, पुष्करमूल, अम्लवेतस, एला, हिङ्गु, अगुरु, सुरसा, तामलकी, जीवन्ती और चण्डा - ये दस श्वासहराणि होते हैं।
३८. श्वयथुहराणि: पाटला, अग्निमन्थ, श्योनाक, बिल्व, काश्मर्य, कण्टकारिका, बृहती, शालपर्णी, पृश्निपर्णी और गोक्षुरक - ये दस श्वयथुहराणि होते हैं।
३९. ज्वरहराणि: सारिवा, शर्करा, पाठा, मञ्जिष्ठा, द्राक्षा, पीलू, परूषक, अभया, आमलक और बिभीतक - ये दस ज्वरहराणि होते हैं।
४०. श्रमहराणि: द्राक्षा, खर्जूर, प्रियाल, बदर, दाडिम, फल्गु, परूषक, इक्षु, यव और षष्टिका - ये दस श्रमहराणि होते हैं।
४१. दाहप्रशमनानि: लाजा, चन्दन, काश्मर्यफल, मधूक, शर्करा, नीलोत्पल, उशीर, सारिवा, गुडूची और ह्रीवेर - ये दस दाहप्रशमनानि होते हैं।
४२. शीतप्रशमनानि: तगर, अगुरु, धान्यक, शृङ्गवेर, भूतीक, वचा, कण्टकारी, अग्निमन्थ, श्योनाक और पिप्पली - ये दस शीतप्रशमनानि होते हैं।
४३. उदर्दप्रशमनानि: तिन्दुक, प्रियाल, बदर, खदिर, कदर, सप्तपर्ण, अश्वकर्ण, अर्जुन, असन और अरिमेदा - ये दस उदर्दप्रशमनानि होते हैं।
४४. अङ्गमर्दप्रशमनानि: विदारीगन्धा, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, एरण्ड, काकोली, चन्दन, उशीर, एला और मधुक - ये दस अङ्गमर्दप्रशमनानि होते हैं।
४५. शूलप्रशमनानि: पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शृङ्गवेर, मरिच, अजमोदा, अजगन्धा, आजाजी और गण्डीर - ये दस शूलप्रशमनानि होते हैं।
४६. शोणितस्थापनानि: मधु, मधुक, रुधिर, मोचरस, मृत्कपाल, लोध्र, गैरिक, प्रियङ्गु, शर्करा और लाजा - ये दस शोणितस्थापनानि होते हैं।
४७. वेदनास्थापनानि: शाल, कट्फल, कदम्ब, पद्मक, तुम्ब, मोचरस, शिरीष, वञ्जुल, एलवालुक और अशोक - ये दस वेदनास्थापनानि होते हैं।
४८. सञ्ज्ञास्थापनानि: हिङ्गु, कैटर्य, अरिमेदा, वचा, चोरक, वयस्था, गोलोमी, जटिला, पलङ्कषा और शोकरोहिणी - ये दस सञ्ज्ञास्थापनानि होते हैं।
४९. प्रजास्थापनानि: ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या, सहस्रवीर्या, अमोघा, अव्यथा, शिवा, अरिष्टा, वाट्यपुष्पी और विष्वक्सेनकान्ता - ये दस प्रजास्थापनानि होते हैं।
५०. वयःस्थापनानि: अमृता, अभया, धात्री, मुक्ता, श्वेता, जीवन्ती, अतिरसा, मण्डूकपर्णी, स्थिरा और पुनर्नवा - ये दस वयःस्थापनानि होते हैं।
गुण की परिभाषा एवं पंचभौतिकत्व
गुण की परिभाषा
जो द्रव्य में आश्रित होकर रहता है, स्वयं किसी अन्य गुण या कर्म का आश्रय नहीं बनता तथा द्रव्य के कर्म को प्रभावित करता है, उसे गुण कहते हैं। चरक के अनुसार गुण द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से स्थित होते हैं और इनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता।
गुण का पंचभौतिकत्व
सभी गुण पंचमहाभूतों के संयोग से उत्पन्न होते हैं, परन्तु किसी गुण में किसी एक महाभूत की प्रधानता रहती है:
- पृथ्वी प्रधान: गुरु, स्थिर, कठोर आदि।
- आप (जल) प्रधान: स्निग्ध, द्रव, मृदु आदि।
- तेज (अग्नि) प्रधान: उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म आदि।
- वायु प्रधान: लघु, चल, सूक्ष्म आदि।
- आकाश प्रधान: सूक्ष्म, विशद आदि।
२० गुरुवादि गुणों का विवरण
- गुरु: भारी, पोषक, कफवर्धक। उदाहरण: दूध, मांस।
- लघु: हल्का, शीघ्र पाच्य, कफहर। उदाहरण: मूंग।
- मन्द: धीमी क्रिया, अग्निमन्द्यकारक। उदाहरण: दूध।
- तीक्ष्ण: तीव्र, भेदन एवं पाचनकारी। उदाहरण: शुण्ठी, मरिच।
- हिम: शीतल, पित्तशामक। उदाहरण: चन्दन।
- उष्ण: ऊष्माजनक, वात-कफशामक, पित्तवर्धक। उदाहरण: अदरक।
- स्निग्ध: तैलयुक्त, मृदुकारक, वातशामक। उदाहरण: घृत।
- रूक्ष: शोषक, कफ-मेदहर, वातवर्धक। उदाहरण: यव।
- श्लक्ष्ण: चिकना एवं कोमल, व्रणरोपण में सहायक।
- खर: खुरदरा, लेखन एवं शोषणकारी।
- सान्द्र: सघन, धातु एवं मल को संघटित करने वाला।
- द्रव: तरल, प्रवाह एवं क्लेदन बढ़ाने वाला।
- मृदु: कोमल, शैथिल्य एवं मृदुता उत्पन्न करता है।
- कठोर: दृढ़ता उत्पन्न करने वाला।
- स्थिर: स्थिरता एवं बन्धन उत्पन्न करता है।
- सर: गतिशील, प्रवाह बढ़ाने वाला।
- सूक्ष्म: सूक्ष्म स्रोतों में प्रवेश करने वाला।
- स्थूल: स्थूल मार्ग में स्थित, अवरोधक।
- विशद: दोष एवं मल को अलग करने तथा शोधन में सहायक।
- पिच्छिल: चिकना, आवरणकारी एवं बन्धनकारी।
गुरुवादि गुणों का दोष, धातु एवं मल पर कर्म
गुणों का सिद्धान्त “सामान्य वृद्धि का कारण तथा विशेष क्षय का कारण” पर आधारित है।
- गुरु-लघु: गुरु कफ एवं मेद बढ़ाता है, वात को कम करता है, धातुपोषण करता है। लघु कफ एवं मेद को कम करता है, अग्नि को बढ़ाता है।
- मन्द-तीक्ष्ण: मन्द अग्नि को कम करता है। तीक्ष्ण अग्निदीपन एवं आमपाचन करता है।
- हिम-उष्ण: हिम पित्तशामक है। उष्ण वात-कफशामक और अग्निदीपक है।
- स्निग्ध-रूक्ष: स्निग्ध वातहर और मृदुकारक है। रूक्ष कफ-मेदहर और वातवर्धक है।
- स्थिर-सर: स्थिर वात की गति को रोकता है। सर मल-मूत्र के प्रवाह को बढ़ाता है।
- सूक्ष्म-स्थूल: सूक्ष्म स्रोतों में प्रवेश करता है। स्थूल शरीर में बृंहण बढ़ाता है।
गुरुवादि गुणों का चिकित्सीय प्रयोग
- गुरु गुण: कृशता और दुर्बलता में उपयोगी।
- लघु गुण: स्थौल्य और मन्दाग्नि में उपयोगी।
- तीक्ष्ण गुण: आम और कफावरोध में उपयोगी।
- हिम गुण: दाह और रक्तपित्त में उपयोगी।
- स्निग्ध गुण: वातव्याधि और मलावरोध में उपयोगी।
- सूक्ष्म गुण: औषधि को गहरे स्तर तक पहुँचाने में सहायक।
परादि गुण (Paradi Gunas)
ये गुण चिकित्सा की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
- पर: किसी विशेष परिस्थिति में अधिक उपयोगी या श्रेष्ठ द्रव्य।
- अपर: अपेक्षाकृत कम श्रेष्ठ या कम उपयुक्त द्रव्य।
- युक्ति: अनेक द्रव्यों एवं उपायों का उचित विचार करके प्रयोग करना।
- संख्या: द्रव्यों या घटकों की संख्या (जैसे त्रिफला में ३ द्रव्य)।
- संयोग: दो या अधिक द्रव्यों का मिलना (जैसे त्रिकटु)।
- विभाग: संयुक्त पदार्थ का पृथक्करण।
- पृथक्त्व: पदार्थों की भिन्नता या विशिष्टता का बोध।
- परिमाण: मात्रा या औषधि की उचित खुराक (Dose)।
- संस्कार: प्रक्रिया द्वारा गुणों में परिवर्तन (जैसे शोधन, मर्दन)।
- अभ्यास: किसी द्रव्य या आहार का निरंतर सेवन करने से उत्पन्न अनुकूलन।