आयुर्वेदिक रोग विज्ञान: प्रमुख व्याधियों के निदान, लक्षण और सम्प्राप्ति का विस्तृत विवरण

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शूल (Shoola): परिभाषा, निदान और भेद

शूल परिभाषा: शङ्कुस्फोटनवत्तस्य यस्मात्तीव्राश्य वेदनाः । शूलासक्तस्य लक्ष्यन्ते तस्माच्छूलमिहोच्यते ॥ (सु.उ. 42/81)
अर्थात् जिस रोग में शरीर में शङ्कु स्फोट के समान तीव्र पीड़ा हो, उसे शूल कहते हैं।

पर्याय: रुज्, रुजा, उपताप, रोग, व्याधि, गद, आतङ्क (अमरकोष)।

शूल के सामान्य निदान

  • वात, मूत्र एवं पुरीष के वेगों का धारण।
  • अतिभोजन, अजीर्ण एवं अध्यशन।
  • विरुद्धहार सेवन।
  • पिष्टान्न एवं शुष्कमांस का सेवन।
  • विरुढान्न (अंकुरित या विकृति अंकुर धान्य) का सेवन।

शूल के भेद और सम्प्राप्ति

भेद: (1) वातिक शूल (2) पैत्तिक शूल (3) कफज शूल (4) वातपित्तज (5) द्वन्द्वज शूल (6) वातकफज (7) सन्निपातज शूल (8) पित्तकफज (9) आमज शूल।

सम्प्राप्ति घटक:

  • दोष: वात प्रधान (कफपित्तानुबंध)
  • दूष्य: अन्न, पुरीष, रस
  • स्रोतस: अन्नवह, रसवह, पुरीषवह स्रोतस
  • स्रोतोदुष्टि: संग एवं विमार्गगमन
  • अग्नि: मन्दाग्नि
  • अधिष्ठान: 5 बताए गए हैं।
  • स्वभाव: आशुकारी, दारुण एवं चिरकालिक
  • उद्भव: आमपक्वाशयोत्थ

दोषज शूल के लक्षण

1. वातिक शूल

निदान: रूक्ष, शीत एवं अल्प आहार, उपवास, अधिक व्यायाम, वेगधारण।
लक्षण: तीक्ष्ण, चल एवं आकस्मिक वेदना, आध्मान, आटोप, विबन्ध। हृदयशूल, पार्श्वशूल, पृष्ठशूल, त्रिकशूल, वस्तिशूल इसके मुख्य स्थान हैं।

2. पैत्तिक शूल

निदान: अम्ल, लवण, कटु, उष्ण एवं विदाही आहार, क्रोध।
लक्षण: तीव्र एवं दाहयुक्त शूल, तृष्णा, स्वेद, अम्लोद्गार, मुख में कड़वाहट। शीतोपचार से आराम मिलता है।

3. कफज शूल

निदान: गुरु, स्निग्ध, मधुर एवं शीत आहार, दिवास्वप्न।
लक्षण: मन्द, स्थिर एवं गुरु शूल, उदरगौरव, अरुचि, हृल्लास, तन्द्रा। उष्णता से आराम मिलता है।

4. आमज शूल

लक्षण: भोजन के बाद शूल, अरुचि, गौरव, हृल्लास, जिह्वालेप, दुर्गन्धयुक्त उद्गार। आम पचने या वातानुलोमन से शूल में कमी होती है।

बिन्दुपरिणाम शूलअन्नद्रव शूल
अर्थभोजन के पाचन के समय उत्पन्न होने वाला शूलभोजन के आमाशय में पहुँचते ही उत्पन्न होने वाला शूल
शूल का समयभोजन के कुछ समय बाद, पाचन के दौरानभोजन करते समय या भोजन के तुरन्त बाद
मुख्य पहचानपाचन के समय दर्दभोजन के साथ/तुरन्त बाद दर्द

अतिसार (Atisara): निरुक्ति और वर्गीकरण

निरुक्ति: अतिशयेन सारयति मलं इति अतिसारः। अर्थात् गुदमार्ग से अत्यधिक मात्रा एवं बार-बार द्रव मल का प्रवर्तन।

अतिसार के निदान और सम्प्राप्ति

सामान्य निदान: गुरु, अतिस्निग्ध, अतिरूक्ष आहार; विरुद्धाशन, अजीर्णावस्था में भोजन, दूषित जल, भय-शोक।

सम्प्राप्ति: निदान सेवन → वातप्रकोप → जठराग्निमन्द्य → मल में द्रवता → अधोमार्ग से प्रचुर द्रव मलप्रवृत्ति।

दोषज अतिसार के लक्षण

  • वातज: अल्प-अल्प मात्रा में फेनिल, रूक्ष एवं श्याव मल, उदरशूल।
  • पित्तज: पीत/हरित मल, दुर्गन्धयुक्त, दाह, तृष्णा, गुददाह।
  • कफज: श्वेत, पिच्छिल एवं गुरु मल, श्लेष्मायुक्त, मन्दाग्नि।
  • रक्तज: मल में रक्त, दाह, शूल, पित्तज लक्षण।

ग्रहणी रोग (Grahani Roga)

सामान्य सम्प्राप्ति: मन्दाग्नि → दोषप्रकोप → ग्रहणीदुष्टि → अन्न का अपक्व पाचन → बार-बार मलप्रवृत्ति (कभी बद्ध तो कभी द्रव)।

बिन्दुअतिसारग्रहणी रोग
मुख्य विकृतिद्रव मल की अतिप्रवृत्तिअग्नि एवं ग्रहणी की विकृति
मलमुख्यतः द्रव, बार-बारकभी द्रव, कभी बद्ध, आम/अपक्व

शोथ (Shotha): सूजन के कारण और प्रकार

सम्प्राप्ति: दोषप्रकोप → स्रोतसों में अवरोध → स्थानीय द्रव/रक्त संचय → त्वचा एवं मांस का उत्सेध → शोथ।

  • वातज शोथ: कृष्ण/अरुण वर्ण, चल, तीव्र वेदना।
  • पित्तज शोथ: पीत/रक्त वर्ण, दाह, उष्णता, शीघ्र पाक।
  • कफज शोथ: श्वेत वर्ण, स्थिर, शीत, मन्द वेदना, खुजली।

श्वास और कास (Respiratory Disorders)

श्वास (Dyspnoea/Asthma)

भेद: महाश्वास, ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास, तमकश्वास, क्षुद्रश्वास।
तमक श्वास: तीव्र श्वासकष्ट, घुरघुराहट, रात्रि में वृद्धि, बैठने से राहत। इसे आधुनिक Bronchial Asthma से जोड़ा जा सकता है।

कास (Cough)

सम्प्राप्ति: कुपित प्राणवायु का प्रतिलोम गमन होकर मुख से सशब्द वायु का निकलना।
भेद: वातज, पित्तज, कफज, क्षतज, क्षयज।

ज्वर (Jwara): बुखार के प्रकार और अवस्थाएँ

परिभाषा: देह-मन को संताप देने वाला रोग ज्वर कहलाता है। इसका मुख्य लक्षण सर्वशरीर संताप है।

अवस्थाएँ:

  • आम ज्वर: गौरव, अरुचि, जिह्वालेप।
  • पच्यमान ज्वर: संताप/दाह में परिवर्तन।
  • निराम ज्वर: शरीर में लघुता, भूख लगना, स्फूर्ति।

पाण्डु, स्थौल्य और कार्श्य

पाण्डु (Anemia): पित्त प्रधान व्याधि जिसमें त्वचा का वर्ण फीका (पाण्डु/पीत) पड़ जाता है।
स्थौल्य (Obesity): मेद की असामान्य वृद्धि, क्षुद्रश्वास, अतिनिद्रा।
कार्श्य (Emaciation): शरीर एवं मांस की अत्यधिक कमी, दुर्बलता।

रक्तपित्त और कामला

रक्तपित्त: पित्त द्वारा रक्त का दूषण होकर ऊर्ध्व (नाक, मुख) या अधो (गुदा, मूत्रमार्ग) मार्ग से रक्तस्राव।
कामला (Jaundice): पित्त प्रकोप से त्वचा, नेत्र और मूत्र का पीतवर्ण होना। इसके दो मुख्य प्रकार हैं: कोष्ठाश्रित और शाखाश्रित

उदर रोग (Abdominal Diseases)

मुख्य लक्षण: उदर की असामान्य वृद्धि (कुक्षेराध्मानं)।
भेद: वातोदर, पित्तोदर, कफोदर, प्लीहोदर, जलोदर (Ascites), बद्धगुदोदर, छिद्रोदर।

कुष्ठ (Skin Diseases)

चरक के अनुसार कुष्ठ के 18 भेद हैं:
1. 7 महाकुष्ठ: कपाल, औदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्वा, पुण्डरीक, सिध्म, काकणक।
2. 11 क्षुद्रकुष्ठ: एककुष्ठ, किटिभ, विपादिका, दद्रु, पामा आदि।

प्रमेह (Urinary Disorders/Diabetes)

प्रत्यात्म लक्षण: प्रभूतमूत्रता (अत्यधिक मूत्र) एवं अविलमूत्रता (मैला मूत्र)।
वर्गीकरण: कुल 20 भेद (कफज 10, पित्तज 6, वातज 4)। मधुमेह को वातज प्रमेह के अंतर्गत असाध्य माना गया है।

वातव्याधि, आमवात और वातरक्त

  • वातव्याधि: शूल, कम्प, सुप्तता और अंगों की चेष्टाहानि।
  • आमवात (Rheumatoid Arthritis): मन्दाग्नि जनित 'आम' और 'वात' का संयोग। सन्धियों में बिच्छू के डंक जैसी पीड़ा।
  • वातरक्त (Gout): वात और रक्त का दूषण। विशेषतः हाथ-पैरों की छोटी सन्धियों (अंगूठे) से प्रारम्भ।

विसर्प और शीतपित्त

विसर्प (Erysipelas): सर्प के समान शीघ्र फैलने वाला त्वचा विकार।
शीतपित्त (Urticaria): शीत वायु के स्पर्श से त्वचा पर लाल चकत्ते और खुजली होना।

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